
अब तो मेरा ही
शहर मुझे कितना
अजनबी लगता है
वैसे भी अपने ही
मैं लंबे समय से
बंद कर रखा था
जाना , नहीं चाहता था
वो लोग टकराए
जिनको जिंदगी भर
अपना समझ न जाने
कितना ही समय देता रहा
पर जब सचमुच अकेला
हो गया था
किसी ने भी मेरे
आंगन में दस्तक नही दी
मन ऊब चुका था
अपनपने से, अपनो से
आत्मीयता जिसे देवत
शब्दों से
बकवास लगते थे
तभी तुम पता नहीं
क्यों टकरा गई
उस दो बेवज़ह
बेहिसाब प्यार और
अपनापन लिए
मेरा चिन्ता और ख्याल लिए
जबकि तुम्हारा
मेरा रिश्ता ऐसा नहीं था
न मैने कभी सोचा तुम
इस तरह इतनी
संवेदना लिए हो
मुझे लेकर क्यों नहीं
जानता था
बस अनायास तुम ने
ख़ुद दोस्ती का हाथ
बढ़ाया, मुझे नहीं पता
क्यों इतनी जल्दी
निराश मन आत्मा ने
उसे स्वीकृत दे दी
जब पुराने खास मित्र
अपने ही अपने नहीं रहे
तो तुम फिर
खैर पता नहीं
तुम्हारे मेरे लिए
जन्म लिया या पहले से
विराजमान अपनापन था
ख्याल था
खैर पता नहीं चला
कब शहर से
कुछ आशा की
अपनेपन की हल्की सी
महक मं में दस्तक देने लगी
और तुम हो न अभी
यह सोच कभी कभी
साल में तीन चरण बार
निकल आया था
बिना कोई आशा और अपनापन
सोच के
पर जब से
तुमने भी शहर छोड़ दिया
वो गली वो मकान तो
बहुत दुख की बात
मैने अपना शहर ही
छोड़ दिया
जहां न जाने कितनी
कीमती सांसे दी
जो सब व्यर्थ लगीं
अब तो हर पल हर दिन
अपनी सांसों का
हिसाब रखता हूं
कहां कितनी खर्च करना है
क्यों करना है
क्या होगा परिणाम
ताकि फिर कभी
जीवन में नहीं लगे
मैने अपनी कीमती
सांसो को व्यर्थ किया
इसलिए मन आत्मा में
वो गली वो मकान
बसा ली ताकि
उनके जब चाहा दर्शन कर
प्रणाम कर जी लेता हूं
उस अद्भुत ईश्वरीय आशीष को
महसूस करता हुआ
जो मेरी तीसरी जिंदगी की
खुशहाली और उन्नति की
पावन पवित्र सांसे है
बहुत है जिन के लिए
जीते हुए बहुत बहुत कुछ
करने के लिए
प्रणाम रूह सत् सत् प्रणाम
तुम्हें और वो गली वो मकान को
सत् सत् प्रणाम
डॉ रामशंकर चंचल
झाबुआ मध्य प्रदेश




