साहित्य

जंतर-मंतर पर सोनम वांगचुक का अनशन लोकतंत्र की आवाज

प्रतिमा पाठक

भारत में लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति यह है कि नागरिक अपनी बात शांतिपूर्ण ढंग से सरकार तक पहुँचा सकते हैं। इसी लोकतांत्रिक परंपरा को आगे बढ़ाते हुए प्रसिद्ध शिक्षाविद्, पर्यावरणविद् और समाजसेवी सोनम वांगचुक इन दिनों नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर अनिश्चितकालीन अनशन पर बैठे हैं। यह अनशन कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) द्वारा देश में परीक्षा प्रणाली की पारदर्शिता, युवाओं के भविष्य और जवाबदेही की माँग से जुड़ा हुआ है। उनके इस आंदोलन ने पूरे देश का ध्यान शिक्षा व्यवस्था और युवाओं के सामने खड़ी चुनौतियों की ओर आकर्षित किया है। परीक्षा प्रणाली से परेशान होकर छात्रों द्वारा खुदकुशी भी एक मुद्दा है कि आखिर कब तक ऐसे ही छात्र बलि की वेदी पर अपने प्राण खोते रहेंगे।

सोनम वांगचुक का मानना है कि किसी भी राष्ट्र की सबसे बड़ी पूँजी उसके युवा होते हैं। यदि परीक्षाओं में अनियमितताएँ, प्रश्नपत्र लीक और चयन प्रक्रिया पर अविश्वास बढ़ेगा, तो लाखों मेहनती विद्यार्थियों का मनोबल टूटेगा। इसी चिंता को सामने रखते हुए उन्होंने जंतर-मंतर पर भूख हड़ताल आरंभ की। वे इसे केवल एक परीक्षा या एक घटना का मुद्दा नहीं, बल्कि देश के युवाओं के भविष्य और शिक्षा व्यवस्था में विश्वास बहाल करने का प्रश्न मानते हैं।

अनशन के दौरान उन्होंने स्पष्ट किया कि उनका उद्देश्य किसी व्यक्ति विशेष से संघर्ष करना नहीं, बल्कि सरकार का ध्यान विद्यार्थियों की समस्याओं और शिक्षा व्यवस्था में आवश्यक सुधारों की ओर आकर्षित करना है। उनका कहना है कि लोकतंत्र में सरकार और जनता के बीच संवाद होना चाहिए तथा युवाओं की आवाज़ को गंभीरता से सुना जाना चाहिए।

19 दिनों के लंबे समय से जारी इस अनशन का प्रभाव उनके स्वास्थ्य पर भी पड़ा है। उनका वजन निरन्तर घट रहा है और चिकित्सकों ने उनके स्वास्थ्य को लेकर चिंता व्यक्त की है। लेकिन सरकार चुप्पी साधे बैठी है। सरकार के इस निराशाजनक रवैये के बीच दिल्ली उच्च न्यायालय में भी उनकी स्वास्थ्य सुरक्षा को लेकर याचिका दायर की गई, जिस पर अदालत ने केंद्र और दिल्ली सरकार से जवाब माँगा है।

सोनम वांगचुक का यह आंदोलन अहिंसा और सत्याग्रह की परंपरा का उदाहरण प्रस्तुत करता है। उन्होंने हिंसा या टकराव का मार्ग नहीं अपनाया, बल्कि शांतिपूर्ण अनशन के माध्यम से अपनी बात रखने का प्रयास किया है। उनका विश्वास है कि लोकतंत्र में संवाद, संवेदनशीलता और जनभागीदारी ही समस्याओं के स्थायी समाधान का मार्ग हैं। यही कारण है कि समाज के विभिन्न वर्गों- छात्रों, शिक्षाविदों और अनेक नागरिकों व समाज सेवियों ने उनके प्रति समर्थन व्यक्त किया है।

यह आंदोलन केवल एक व्यक्ति का संघर्ष नहीं, बल्कि उन लाखों युवाओं की भावनाओं का प्रतीक बन गया है जो ईमानदारी और मेहनत के आधार पर अपना भविष्य बनाना चाहते हैं। यह हमें याद दिलाता है कि शिक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता किसी भी राष्ट्र के विकास की आधारशिला होती है। यदि विद्यार्थियों का विश्वास डगमगा जाए, तो समाज और राष्ट्र दोनों पर उसका दूरगामी प्रभाव पड़ता है।

सोनम वांगचुक का जंतर-मंतर पर जारी अनशन लोकतंत्र, पारदर्शिता और उत्तरदायित्व की माँग का प्रतीक है। चाहे इस आंदोलन का समाधान जिस रूप में निकले, यह स्पष्ट है कि इससे देश में शिक्षा सुधार, युवाओं के अधिकार और शासन की जवाबदेही पर व्यापक चर्चा प्रारंभ हो गयी है।

आशा है कि सभी पक्ष संवाद और समझदारी से ऐसा समाधान खोजेंगे जिससे विद्यार्थियों का विश्वास मजबूत हो, शिक्षा व्यवस्था अधिक पारदर्शी बने और लोकतांत्रिक मूल्यों की प्रतिष्ठा बनी रहे।

प्रतिमा पाठक

लेखिका/ समाज सेविका

दिल्ली

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