साहित्य

पिता

पंडित मुल्क राज

पीठ का दर्द हाथों के छाले, हँसकर सह जाता है पिता*,

*बच्चों की खुशियों की खातिर, मेहनत करता जाता है पिता*।

 

*दिन भर धूप में जलता है वो, बनकर साया अपनों का*,

*खुद तपन पथ चलता है वो, सच करने ख्वाब बच्चों का*।

 

*उंगली पकड़ जिसे चलना सिखाया, वो भी अब रूठ गया*,

*जिसके लिए थे सपने सजाए, उससे बतियाना छूट गया*।

 

*बरसों पसीना बहाता रहा जो, पाई पाई को तरसता है*,

*अपनों की बेरुखी देखकर, अंदर ही अंदर सिसकता है*।

 

*उम्र ढली कमजोर हुआ तन , सहारे को अब तरसता है*,

*जिसके दम पर कुनबा खाता, क्रोध उसी पर सबका बरसता है*।

 

*कापते हाथों से अक्सर वो, पुरानी यादें टटोलता है*,

*बात नहीं करता कोई उससे, खुद से ही बातें करता है*।

 

*तस्वीर धुंधली हो गई बेशक, यादें आज भी जिंदा है*,

*औलाद के ऐसे बर्ताव पर इंसानियत भी आज शर्मिंदा है*।

 

*वक्त बदला बच्चे बदले, भूल गए वो प्यार पुराना*,

*पिता की बूढ़ी आंखों का, अब रोना है बस एक बहाना*।

 

*ए-आँसू ना छोड़ के जाना, साथ निभाना हर मोड़ पर*,

*यह दर्द बयां है एक पिता का श्वांसो के अंतिम छोर पर*।

 

***********************

 

*पंडित मुल्क राज “आकाश”*

*गाजियाबाद उत्तर प्रदेश*

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
error: Content is protected !!