
“समाज की नजर”
बारिश के बाद की शाम थी।
गली के नुक्कड़ पर चार लोग हमेशा की तरह प्लास्टिक की कुर्सियाँ डालकर बैठे थे। चाय की भाप उड़ रही थी और बातें किसी की जिंदगी का फैसला कर रही थीं।
“सुना क्या? सीमा अब कलेक्टर बन गई है… IAS!”
एक आदमी ने कहा।
दूसरा हँसा —
“अरे बनने दो… घर में उसका पति क्या करता है? दिनभर बच्चों को संभालता है, झाड़ू-पोछा करता है। असली मर्द होता तो बीवी से आगे रहता।”
तीसरे ने धीरे से सिगरेट सुलगाई —
“इतनी बड़ी अफसर और इतना निकम्मा पति? कुछ तो गड़बड़ होगी। ऐसी औरतें बाहर इज्जत कमाती हैं… घर में नहीं टिकतीं।”
उनकी हँसी सड़क पर फैल गई।
उसी समय सफेद सरकारी गाड़ी गली में आकर रुकी।
सीमा उतरी। सादी कॉटन की साड़ी, थका हुआ चेहरा, लेकिन आँखों में सख्ती।
लोग तुरंत खड़े हो गए।
“नमस्ते मैडम!”
अभी जो लोग उसके चरित्र का हिसाब लगा रहे थे, वही अब झुककर सलाम कर रहे थे।
सीमा मुस्कुराई नहीं।
वह सब समझती थी।
ऑफिस में लोग उसकी फाइलों से डरते थे, लेकिन समाज उसकी सफलता से नहीं — उसके पति से परेशान था।
घर के अंदर उसका पति रवि रसोई में रोटी सेंक रहा था।
“आज देर हो गई,” उसने पूछा।
“मीटिंग थी,” सीमा ने बैग रखते हुए कहा।
रवि ने प्लेट आगे कर दी।
“खाना खा लो।”
सीमा उसे देखती रही।
उसे याद आया — जब उसने UPSC की तैयारी की थी, तब रवि ने अपनी छोटी नौकरी छोड़कर घर संभाला था। लोगों ने तब भी कहा था —
“जोरू का गुलाम।”
लेकिन उसी “गुलाम” ने रात-रात जागकर उसकी नोट्स बनाई थीं, इंटरव्यू से पहले उसका डर संभाला था।
बाहर समाज को सिर्फ इतना दिखता था कि पति झाड़ू लगाता है।
उन्हें यह नहीं दिखता था कि वह अपनी पत्नी के सपनों के नीचे मजबूत जमीन बनकर खड़ा है।
अगले दिन सीमा एक महिला सम्मेलन में गई।
मंच से उसने कहा —
“समाज आज भी सफल औरत को उसके काम से नहीं, उसके पति की कमाई और मर्दानगी से तौलता है।
अगर पति घर संभाले तो लोग उसे निकम्मा कहते हैं।
अगर पत्नी आगे बढ़ जाए तो उसके चरित्र पर शक करते हैं।
असल में समस्या किसी औरत की सफलता नहीं… लोगों की सोच है।”
हॉल तालियों से गूंज उठा।
लेकिन गली के नुक्कड़ पर बैठे लोग फिर भी नहीं बदले।
क्योंकि कुछ लोगों को औरत की जीत से ज्यादा तकलीफ उस आदमी से होती है जो उसके साथ बराबरी से खड़ा रहता है।
— सपना कुमारी, कोल्हापुर


