
सावन की ऋतु फिर से आयी, आजा साजन पास।
तेरी छवि बूँदों में छायी , पावस करे उदास।।
पावस की ऋतु है मतवाली , लगती दुनिया खास।
भीग रहे हैं धरती – अंबर , आए तन को रास।।
सपनों में झूमे है सावन , प्रेम करे परिहास।
तेरी छवि बूँदों में छायी, पावस करे उदास।।
जलचर थलचर मिलने आतुर,दादुर करते शोर।
कब आओगे मेरे मधुकर,उर में नाचे मोर।।
रिमझिम – रिमझिम बरखा बरसे,जगी मिलन की आस।
तेरी छवि बूँदों में छायी, मन को करे उदास।।
छम -छम करती बरखा पायल ,गाए गीत समीर।
करे बिजुरिया मन को घायल , तन – मन उमड़े पीर।।
झर -झर झरी व्यथा बादल की , रचे विरह इतिहास । तेरी छवि बूँदों में छायी, पावस करे उदास।।
आग लगाए बरखा रानी, बरसे दृग से नीर ।
धोए आँगन आँसू पानी , मेघ रहा जग चीर।।
धड़कन में तेरी धुन बजती , मन में जागी प्यास।
तेरी छवि बूँदों में छायी, पावस करे उदास।।
डॉ मंजु गुप्ता
वाशी , नवी मुंबई




