
नित कृषि मन को समझाएं, घूँट- घूँट आँसू पीते।
लूट प्रगति ने खूब मचाई, अब जीवन कैसे बीते।।
संकट अनगिन आने वाला, सूख कहेगी हर क्यारी।
वर्षा रानी हमसे रूठी ,न सुने है बात हमारी ।।
बादल गरजे बिजली चमके, बदल चली बरखा डेरा।
बिन पानी के मातम छाये , कैसे हो स्वर्ण सवेरा ।
भवन गगनचुंबी बना लिए ,कर ली जीवन को कारी।
वर्षा रानी हमसे रूठी, न सुने हैं बात हमारी।।
पाले -पोषे धरणी हमको, छलते पगले माटी को।
संग युवा पीढ़ी के बदले, वसुंधरा की परिपाटी।।
लौटाएँगे फिर हरियाली,
कर ले जन-जन तैयारी।
वर्षा रानी हमसे रूठी, न सुने हैं बात हमारी।।



