साहित्य

छात्रों के सवाल और सत्ता की खामोशी

प्रतिमा पाठक

जंतर-मंतर की सड़कों पर

कुछ सपने बैठे थे,

हाथों में तख्तियां नहीं,

अपने भविष्य की फरियाद लिए।

वे बस इतना पूछ रहे थे-

मेहनत की रातों का हिसाब कौन देगा?

किताबों में डूबे वर्षों का जवाब कौन देगा?

पेपर लीक की खबर आई,

कई चेहरों की मुस्कान छीन गई,

किसी की उम्मीद टूटी,

किसी की आंखों की नींद गई।

न्याय मांगने निकले थे बच्चे,

पर रास्ते में वर्दियां खड़ी थीं,

हाथों में सवाल थे उनके,

सामने लाठियां पड़ी थीं।

आंसू गैस के धुएं में

सिर्फ आंखें ही नहीं जलीं,

भरोसे की दीवारें भी

धीरे-धीरे पिघल चलीं।

लाठी की आवाज गूंजती रही,

छात्रों के नारे दबते रहे,

और सत्ता के गलियारों में

मौन के दीप सजते रहे।

कुर्सियां व्यस्त रहीं भाषणों में,

फाइलें सोती रहीं अलमारियों में,

जिनके बच्चे परीक्षा देते हैं,

वे खड़े रहे इंतजारों में।

कहते हैं लोकतंत्र में जनता की

आवाज सबसे बड़ी होती है,

पर आज वही आवाज

धूल में पड़ी दिखाई देती है।

यह एक आंदोलन नही,

एक आईना है समय का

जहां सवाल खड़े हैं सड़क पर

और जवाब छिपे हैं महलों में।

कब तक मेहनत हारती रहेगी?

कब तक सच चुप रहेगा?

जिस दिन युवा की उम्मीद जागेगी,

उस दिन एक नया इतिहास लिखेगा।

प्रतिमा पाठक

दिल्ली

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
error: Content is protected !!