साहित्य

समय के साथ चल

सुषमा श्रीवास्तव

सुरुचि की शादी को आज लगभग पांँच दिन हो गए , आज पहली बार उसे रसोई में जाने का मौका मिला । पहले तो घर मे रीति – रिवाज और उसके बाद मेहमानों की इतनी भीड़ भाड़, आज जाकर उसने पहली बार रसोई में कदम रखा था । सभी मेहमान लगभग जा चुके थे और शादी के बाद पहली रसोई के शगुन के नाम से आज सुरुचि को रसोई बनानी थी ।

पर ये क्या ? यहाँ तो पहले ही से सासु माँ खाना बनाने की तैयारी कर रहीं थीं, उसे लगा सासु माँ नाराज़ हैं डरते डरते …… उसने सासु माँ से पूछा , माँ जी ये सब ? आज तो मुझे ही सब बनाना है ना , सासु माँ ने कहा ” हाँ बहु बनाना तो है , लेकिन आज से हम दोनों साथ खाना बनायेंगे , अभी तीन चार दिन तो मुझे तुम्हे समझाना भी पड़ेगा कि हमारे यहांँ कैसा खाना बनता है, और दोनों ने मिल कर खाना बनाना शुरू कर दिया । खाना बनाते बनाते उसकी सासु माँ ने उससे काफी बातें कीं, जैसे उसे सबसे अच्छा क्या बनाना आता है,  सबसे ज्यादा खाने में क्या पसन्द है,न उनके घर मे खाना कौन और कैसे बनाता है , पर इन सबके बीच , सासु माँ ने कुछ ऐसा कहा की सुरुचि की आंँखे खुली की खुली रह गयीं ।

जब उन्होंने बताया कि हमारे यहाँ कोई बर्तन वाली नही आती ,बल्कि सब अपने अपने खाने के बर्तन खुद साफ करते हैं, सुरुचि ने आश्चर्य से उन्हें देखा, क्योंकि  उसने ऐसा कभी कहीं भी नही देखा था या तो हर घर में कोई काम वाली आती या ये सब घर की ही महिला को ही करना पड़ता है। उसे बहुत उत्सुकता हुई ये जानने की, कि कैसे उनके घर में ये परम्परा आयी ? तो उन्होंने बताया – पहले तो जब मेरी शादी हुई तब मेरी सासु माँ और मैं मिल कर सब काम खुद करते थे, फिर धीरे-धीरे चार बेटों की जिम्मेदारी बढ़ गयी, तो हमने काम वाली बाई रखने का फैसला किया, पर उसकी आए दिन रोज-रोज की छुटियों से हम परेशान रहने लगे ।

एक दिन सासु माँ ने भी बिस्तर पकड़ लिया। और रोज़- रोज़ की काम की झिक-झिक सी रहने लगी तब मैंने तय किया कि सभी लोग अपना नाश्ता और खाना निपटा कर अपने बर्तन खुद मांँज लें तो काफी सुकून हो सकता है……हाँ ! लेकिन खाना बनाने वाले बर्तन मैं खुद ही मांँजती,  बाकी सब अपने -अपने खाएं पिए बर्तन स्वयं धोने लगे। मैंने घर के और भी काम बाँटने चाहे थे, पर बच्चों की पढ़ाई में व्यस्तता को देखते हुए नही कर सकी ।

कभी – कभी मेरी तबियत ठीक नहीं होने के कारण बच्चे अपने कपड़े भी खुद धोने लगे , रोज़-रोज़ उनके लिए भी ये मुश्किल था तो इसीलिये मशीन लेनी पड़ी, पर आज भी बच्चे अपने अंडर गारमेंट्स स्वयं ही धोते हैं ।

सुरुचि ने ध्यान दिया कि वो भी जब से इस घर मे आयी है उसने कभी बाथरूम में रोहित के कपड़े नही देखे। नहीं तो ये आम बात है कि घर के मर्द नहाकर निकले नहीं कि औरतों को उनके कपड़े धोने के लिए उधर का रुख करना पड़ता, और हांँ मैंने अपने सब बच्चों को रसोई का इतना काम तो सिखा ही रखा है कि वो यदि मौका पड़ने पर एक-दो टाइम बिना किसी परेशानी के खाना बना सकते हैं, और हमें भी खिला सकते हैं।

अब तुम्हे भी कहते हुए सासु माँ ने मुस्कुराते हुए सुरुचि को देखा, फिर कहने लगी कि तुम्हें ये जानकर और भी आश्चर्य होगा जहांँ आज कल के दौर में भी कोई माँ अपने लड़कों से रसोई का काम करना उसकी बेइज्जती समझती है वहीं मेरी सासु माँ ने उस समय भी इसका पूरा समर्थन किया था।

आज सुरुचि के मन में समाहित सारे भ्रम दूर हो गए थे, जो शादी के नाम से ही उसके भीतर उसके अपनों ने ही बढ़ती उम्र के साथ-साथ पैदा कर दिए थे। जिसके कारण वो पिछले कितने ही महीनों से ढंग सो भी नहीं पायी थी।

वह समझ चुकी थी कि बदलते मौसम की तरह सामाजिक कुरीतियों, सड़ी-गली रूढ़ियों और परम्पराओं से कैसे विवेक पूर्ण ढंग से निजात पाया जा सकता है।

वो यह सोच ही रही थी कि सासु मांँ बोल पड़ीं कि मेरा मानना सिर्फ यही है …. कि केवल बेटियों को ही ससुराल के लिए तैयार न करें , बल्कि बेटों को भी भविष्य में किसी और की बेटी के लिए तैयार करें अगर आप उसके कदम से कदम मिला कर चलने, उसकी नौकरी करने को पसंद करते हैं तो घर के काम में भी उसका सहयोग करें जैसे वो आपका सहयोग करती है।

बहुत छोटी सी ही बात है लेकिन घर के काम तो दोनों को ही सिखाये जाने चाहिए। जब लड़कियों को इसीलिए पढ़ाया जाता है कि भले वो भविष्य में नौकरी करें या न करें लेकिन आवश्यकता पड़ने पर वो इतनी समर्थ हो कि उसे मजबूर न होना पड़े या किसी का मोहताज न रहना पड़े , तो फिर लड़कों को केवल एक ही शिक्षा क्यों ,जबकि घर का काम तो जब तक जीवन है करना ही पड़ता है।

बदलते मौसम को हाँथो हाँथ लेने की भांति समयानुसार समाज में बदलाव लाना भी तो हम सबका कर्त्तव्य है जिनको मिला कर यह समाज खड़ा है।

 

रचनाकार –

सुषमा श्रीवास्तव, मौलिक सृजन ©®, रूद्रपुर, उत्तराखंड।

 

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