
वेदना जब मन के आँगन में,
निःशब्द आँसू बनकर ढलती है,
तब आत्मा की गहराइयों में,
जीवन की सच्चाई पलती है।
हर पीड़ा केवल घाव नहीं,
जीवन का अमूल्य अनुभव भी है,
जो सबका साथ दे सिखलाए,
दूसरों का दुख भी अपना ही है।
संवेदना तब जन्म लेती है,
जब आँख किसी की नम दिखती है,
जो बिन बोले मन पढ़ लेती है,
वही सच्ची मानवता राह चलती है।
एक स्पर्श, एक मधुर वचन,
टूटे मन को संबल दे जाते हैं,
सूखी आशा की डाली पर,
विश्वास के फूल खिला जाते हैं।
और जब संवेदनशीलता,
जीवन का स्वभाव बन जाती है,
तब हर प्राणी में अपना अंश देख,
हर पीड़ा अपनी सी लगती है।
न कोई छोटा, न कोई बड़ा,
सबमें एक ही चेतन ज्योति है,
जिसके हृदय में करुणा बसती,
वहीं सच्ची मानवता होती है।
वेदना ने जो पाठ पढ़ाया,
संवेदना ने उसे स्वर दिया,
संवेदनशीलता ने उस स्वर को,
प्रेम का अनंत सागर कर दिया।
आओ हम ऐसा मन गढ़ें,
जहाँ करुणा का दीप जले,
अपने सुख पाने की ख़ातिर,
किसी और के आँसू न निकले।
यही मनुष्य होने का अर्थ है,
यही जीवन का सच्चा श्रृंगार है,
वेदना से जन्मी संवेदना,
संवेदनशीलता उसका विस्तार है।
स्वरचित मौलिक अभिव्यक्ति
सुमन बिष्ट, नोएडा




