
मैंने उसे
उदासियों के बीच
मुस्कराते देखा!
संघर्षों के बीच
शांत रहते देखा!
मैं सोचती रही
कैसे सह लेती
पीड़ा का भार
कैसे झटक देती
परिस्थितियों के वार!
शायद अशिष्टता होती!
कभी पूछ न पाई
इन प्रश्नों के उत्तर!
आदर का भाव
उमड़ आता
लगती वह औरों से श्रेष्ठतर!
आज समझ पाती हूँ!
जिस पर जो बीतती
वह उसे निभाता
अपनी भाँति!
अच्छा है
दर्द न छलके आँखों से
अपनी पीड़ा
केवल अपनी ही अनुभूति!
मीना जैन
इंदिरापुरम, गाजियाबाद.




