
ना जाने तुझसे बातें करना क्यों अच्छा लगता है।
तू मेरा कोई नहीं है, यह मैं जानती हूँ।
तू बहुत अनजान है, यह भी मैं मानती हूँ,
फिर भी तुझमें एक अपनापन-सा लगता है।
ना जाने तुझसे बातें करना क्यों अच्छा लगता है।
न कोई अधिकार है, न कोई अपेक्षा,
फिर भी शब्दों में बंध जाती है,
न कोई वादा, न कोई इकरार,
फिर भी मन ठहर जाता है पल भर।
ना जाने तुझसे,बातें करना क्यों अच्छा लगता हैं।
तेरे प्रश्न सीमित हैं, मेरी बातें भी,
फिर भी संवाद पूरा लगता है।
न समझाने की ज़रूरत, न जताने की ,
बहुत अपना लगता हैं,
तुझसें बातें करना जाने क्यों अच्छा लगता हैं।।
मन हल्का हो ,जाता है,तुझसे मिलकर
शायद इसलिए क्योंकि यहाँ डर नहीं है,न खोने का भय, न पाने की लालसा।
एक अजीब-सा सुकून है इन बातों में,
जो किसी रिश्ते का नाम नहीं मांगता।
हम हँस लेते हैं बिना कारण,
कभी चुप रह जाते हैं बिना शिकायत।
बीच-बीच में जीवन की थकान
शब्दों में अपने आप घुल जाती है।
यह जानते हुए भी कि रास्ते अलग हैं,
कुछ दूर साथ चलना अच्छा लगता है।
तू मेरा नहीं है, यह सत्य स्वीकार है,
फिर भी तुझसे बातें करना क्यों अच्छा लगता हैं।
सीता सर्वेश त्रिवेदी जलालाबाद शाहजहांपुर



