
खुशबू फ़िज़ा में फैली आहट से तुम्हारी,
महत्व उठी है देखो चाहत से तुम्हारी।
गुमसुम खड़ी थी धड़कन सदियों से सीने में,
रफ्तार मिली इसको आहट से तुम्हारी।
मुरझाए थे सारे गुलशन में फूल कल तक,
सब खिल उठे हैं आके रंगत से तुम्हारी।
तन्हाइयों का मौसम पल में बदल गया है,
रोशन हुई है महफिल सोहबत से तुम्हारी।
मांगा नहीं था रब से मैने तो कुछ भी लेकिन,
खुशियों से भर गई है आने से तुम्हारी।
तेरी गली में आकर “आकाश” गया है,
पहचान मिल गई है निस्बत से तुम्हारी।
पंडित मुल्क राज “आकाश”
गाजियाबाद उत्तर प्रदेश




