साहित्य

प्रदत्त शब्द घोटाला  विधा कविता 

डॉ गीता पांडेय

ऊपर से नीचे तक फैला, रिश्वतखोरी राज यहाँ।

घोटाला कर रहे लोग हैं, गंदा हुआ समाज जहांँ।।

 

नियमों की उड़ती धज्जी है, जनता का विश्वास लुटे।

धन पतियों की प्यास न बुझती, खींच-तान में रहें जुटे।।

 

निर्धन और गरीब हो रहा, पूंँजी पति नित हैं बढ़ते।

खींच रहा पैसे को पैसा,

धन की चोटी वे चढ़ते।।

 

भ्रष्टाचार चरम पर पहुंँचा, नीचे से ऊपर तक है।

बिन पैसे के काम न होता, चोर बजारी घर तक है।।

 

आज व्यवस्था चौपट सारी, मँहगाई की मार सतत्।

कठिन हुआ निर्धन का जीना, फैला भ्रष्टाचार जगत।।

 

घोटालों का राज चरम है, सभी जगह बेईमानी।

दशा श्रमिक की अतिशय बिगड़ी,बिगड़ी है कृषक कहानी।।

 

जनता का हक लूट रहे हैं,ये बेईमान लुटेरे।

मानवता से दूरी रखकर, देते हैं कष्ट घनेरे।।

 

मिलकर ऐसा जतन करे हम, दिन आए कभी न काला।

हाथ नहीं फिर बढ़े किसी का,करने को जग घोटाला।।

 

रंग किसी पर चढ़ने मत दें कैसे भी हो मजबूरी।

सौदे बाजी जो भी करते, रखना उनसे है दूरी।।

 

डॉ गीता पांडेय अपराजिता

सलोन रायबरेली उत्तर प्रदेश

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