
कुछ दिनों पहले मैं अपने गाँव गया था। वही गाँव जहाँ मेरा बचपन बीता था। बरसों बाद जब वहाँ पहुँचा तो मन में पुरानी यादें किसी चलचित्र की तरह घूमने लगीं। बचपन में गाँव के बाहर एक घना जंगल हुआ करता था। गर्मियों की दोपहर में भी वहाँ शीतल हवा बहती थी। पक्षियों का मधुर कलरव सुनाई देता था और बरसात आते ही पेड़-पौधे जैसे नए वस्त्र पहन लेते थे।
लेकिन इस बार दृश्य कुछ और ही था। जंगल की जगह अब बिखरे हुए ठूंठ दिखाई दे रहे थे। कई पेड़ काट दिए गए थे। जहाँ कभी छाँव हुआ करती थी, वहाँ अब तपती धूप धरती को झुलसा रही थी। मन अनायास ही उदास हो गया। ऐसा लगा मानो कोई अपना मुझसे बिछड़ गया हो।
गाँव के तालाब के किनारे बैठा तो एक और बदलाव दिखाई दिया। तालाब का पानी पहले जितना निर्मल नहीं था। उसके आसपास प्लास्टिक की बोतलें, पन्नियाँ और अन्य कचरा फैला हुआ था। मुझे अपने बचपन के दिन याद आ गए, जब हम उसी तालाब के किनारे खेलते थे और बड़े-बुजुर्ग हमें समझाते थे कि प्रकृति हमारी माँ है, इसे गंदा नहीं करना चाहिए।
उसी समय मेरी नजर आसमान की ओर उठी। बादल तो थे, लेकिन बरसात पहले जैसी नहीं रही। गाँव के बुजुर्गों ने बताया कि अब वर्षा अनियमित हो गई है। कभी बहुत अधिक बारिश होती है तो कभी पूरे मौसम में धरती प्यास से तड़पती रहती है। खेतों की फसलें प्रभावित हो रही हैं और किसानों की चिंता बढ़ती जा रही है।
उस शाम मैं अकेला खेतों की मेड़ पर टहल रहा था। मुझे ऐसा लगा जैसे प्रकृति स्वयं मुझसे कुछ कह रही हो। हवा की सरसराहट में एक मौन शिकायत थी—”मैंने तुम्हें शुद्ध हवा दी, मीठा जल दिया, फल-फूल और वन दिए, लेकिन बदले में तुमने मुझे कचरा, प्रदूषण और कटते हुए जंगल दिए।”
उस क्षण मन भीतर तक झकझोर गया। सच तो यह है कि प्रकृति का बदलता स्वरूप किसी एक दिन की घटना नहीं है। यह हमारी छोटी-छोटी लापरवाहियों का परिणाम है। सड़क पर फेंका गया एक प्लास्टिक का टुकड़ा, बिना आवश्यकता काटा गया एक पेड़ और पर्यावरण के प्रति हमारी उदासीनता मिलकर भविष्य के लिए बड़ा संकट खड़ा कर रही है।
घर लौटते समय मैंने मन ही मन एक संकल्प लिया कि जहाँ तक संभव होगा, प्रकृति के संरक्षण में अपना योगदान दूँगा। कचरा इधर-उधर नहीं फेंकूँगा, लोगों को भी जागरूक करूँगा और हर वर्ष कम से कम कुछ पौधे अवश्य लगाऊँगा। मुझे विश्वास है कि यदि प्रत्येक व्यक्ति अपनी जिम्मेदारी समझ ले तो धरती फिर से हरी-भरी हो सकती है।
प्रकृति केवल संसाधन नहीं, बल्कि जीवन का आधार है। यदि हम आज उसे बचाने का प्रयास नहीं करेंगे, तो आने वाली पीढ़ियाँ केवल किताबों में घने जंगल, स्वच्छ नदियाँ और नियमित वर्षा के बारे में पढ़ेंगी। इसलिए समय की पुकार है कि हम प्रकृति को उपभोग की वस्तु नहीं, बल्कि अपने परिवार का सदस्य समझें। जब हम प्रकृति का सम्मान करेंगे, तभी प्रकृति भी हमें जीवन का वरदान देती रहेगी।
~ जीतेन्द्र गिरि गोस्वामी “जीत”
युवा लेखक, कवि एवं साहित्यकार
सक्ती (छत्तीसगढ़)




