साहित्य

कमला देवी

सुषमा श्रीवास्तव

कमला देवी एक धीर गम्भीर प्रकृति की स्वामिनी लगभग 55-56 वर्षीया स्वस्थ मजबूत कद काठी की गौर वर्ण सुलझे तबीयत वाली महिला थीं। पढ़ी-लिखी भी मालूम होती थीं।
कॉलोनी में उनका दबदबा था।हरेक के सुख दुख में साथ देने वाली अपने विचारों व सुझावों में सदैव सकारात्मक दिखाई देने वाली वह हमेशा कैसी भी समस्या से दो-दो हाथ करने को तैयार रहतीं। उन्हें कभी किसी ने ग़मगीन नहीं देखा।
कॉलोनी में ही एक फ्लैट में कहीं दूर से तबादला होकर आए नवल दम्पत्ति से भी उनकी जल्दी ही जान पहचान हो गई। चूँकि पुरुष अर्थात् वैभव कॉर्पोरेट जॉब में था अतः सुबह साढ़े सात बजे ही घर से चला जाता और रात गए आठ बजे के बाद ही आता था।अतः उसकी पत्नी विभूति अपने घर के कामों से फारिग हो कमला देवी के पास पहुँच जाती। अकेले अपने घर पर उसका मन नहीं लगता था। कमला देवी ने उसे बड़े प्यार-दुलार से बेटी सा मान दिया था। धीरे-धीरे विभूति और कमला देवी इतना घुल-मिल गईं कि अनजान व्यक्ति उन्हें एक ही परिवार का हिस्सा या यूँ कहें कि माँ-बेटी ही समझता था।
उधर वैभव भी पत्नी के नये माहौल और एकाकीपन से निश्चिंत हो गया। कारण था कमला देवी का साथ। कमला देवी को भी विभूति की हमेशा फिक्र रहती। कभी उसे देर हो जाती तो स्वयं उसके घर पहुँच जातीं।
यद्यपि दोनों बिल्कुल अलग अलग इलाके की रहने वाली थीं।
कमला देवी जहाँ पूर्व दिशा की रहने वाली तो वहीं विभूति दक्षिण भारत की थी फिर भी इतना अपनत्व जो एक परिवार में भी आज कल मुश्किल से ही देखने को मिलता है।
बातों ही बातों में एक दिन विभूति से कमला देवी ने अपने स्वभावानुसार उसके जन्मदिन के  विषय में पूँछा तो उसने अपना जन्मदिन बताया लेकिन वह जन्म दिन के नाम से बड़ी दुःखी सी हो गई क्योंकि उसके जन्म लेते ही उसकी जन्मदात्री चल बसी थी जिसे उसने देखा भी नहीं था। उसे तो दादी ने ही पाल-पोस कर इतना बड़ा किया था।
इधर विभूति के जन्म की तिथि, माह और सन् सुनकर कमला देवी की आँखों में भी नमी आ गई जिसे वो भरसक प्रयास कर भी रोक न सकीं। क्योंकि यही तो वह तारीख थी जब उनकी गोद सूनी हुई थी।कालांतर में पति के न रहने पर उन्होंने स्वयं को घर-परिवार से दूर व्यवस्थित कर लिया था जहाँ कोई भी उनके विगत अतीत से परिचित नहीं था।
संयोग देखिए दो दुःखी आत्माओं का मिलन ईश्वर ने कैसे कराया। माँ को बेटी और बेटी को  माँ  मिल गई। भावप्रवणता मुखर हो उठी। नयनों की नमी ममता,वात्सल्य प्यार के आँचल में पुलकित हो उठी। अचानक सर्द हवाओं के साथ बारिश की फुहार गिरने लगी मानो प्रकृति भी  कमला देवी और विभूति के अद्वितीय मिलन में बखूबी हिस्सेदारी निभा रही हो।
लेखिका –
सुषमा श्रीवास्तव

रूद्रपुर, ऊधम सिंह नगर, उत्तराखंड।

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