साहित्य

परिवेश

डॉ गीता पांडेय अपराजिता

 

न्याय नहीं है आज जहांँ में, असत जीतता सत हारा।
दुख का पारावार नहीं है, थम सी गई अश्रु धारा ।।

उम्मीदों से टूटा नाता,साथ सभी ने छोड़ा है।
बीच भँवर में नाव फँसी, साहस ने दम तोड़ा है।।
बादल संकट के गहराए,जीना अब लगे गँवारा । न्याय ……………………….

हर पल इस आशा में गुजरा, जीवन कभी सुखद होगा।
पीछे मुड़कर कभी न देखा, जिन कष्टों को था भोगा।।
मुझको इस निष्ठुर दुनिया में,अब दिखता नहीं सहारा। न्याय………………………

कैसा अंतर्द्वंद बना है, बंँधी हुई हूँ मैं बंधन।
अपनों ने ही छला मुझे है,यह उर करता नित क्रंदन।।
पग-पग पर ले समय परीक्षा,मधु भी लगता तब खारा। न्याय ………………………..

सच्चाई से जीना लगता बहुत कठिन है इस जग में।।
झूठ लिए हाथों में डंडा, मिलता है प्रतिपल मग में।
पथ पर कंटक बिछे हुए हैं,लगे कष्ट में जग सारा।। न्याय……………………

सच्चा गीत रचा गीता ने,भोगा जो अन्तर्मन ने।
संघर्षों की व्यथा कही है, छिपी जगत के दर्पण में।।
ऐसे ही परिवेश सदा ही ,नित करती रही गुजारा।
न्याय——‐———–

डॉ गीता पांडेय अपराजिता
सलोन‌ रायबरेली उत्तर प्रदेश

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