
रात चाँदनी निखर गई है।
आँगन में खिली हुई है।।
चंदा अपने पूरे शबाब पर।
मेरा चाँद आया न अभी मेरे घर।।
दुल्हन बन करूँ उनकी प्रतीक्षा।
हर आहट पर दौड़ी आऊँ अंगना।।
जिया मचला जाता है मेरा।
धक, धक धड़के मोरा करजवा।।
ओ रात तू थम जा जरा।
चाँदनी को रख खिला-खिला सा।।
नभ के चाँद न छिप बादलों में।
अब तक आए न पिया मोरे।।
रात की रानी महक खुल कर।
ख़ुशबू फैला दे मेरे घर, आँगन।।
पपीहा गा संकेत दे रहा।
मिलन की अनुभूति मुझे करा रहा।।
उजली रात और मीठा एहसास।
दो दिलों को एक होने की आस।।
नन्द किशोर बहुखंडी
देहरादून, उत्तराखंड




