
जुगनुओं की फौज कितनी हो बड़ी-
स्याह अंधेरे कभी मिटते नहीं।
बन सको तो दीप बनकर तुम जलो-
बादलों के दौर नित चलते नहीं।।
भोर का सूरज कभी छिपता नहीं
रात खुद लाती सबेरा ढूँढकर।
मंजिलें बिन कष्ट के मिलतीं कहाँ-
मुश्किलें आतीं कहाँ हैं पूँछकर।।
कर्मवीरों के मुक़्क़द्दर में सृजन हो-
गीदड़ों के भाग यश मिलते नहीं।।
राम का वनवास गौतम का गमन-
कृष्ण के ही हाथ दुष्टों का शमन।
ले परशु सँहार जब श्रीहरि करें-
हाथ तेरे भी लिखा तम का दमन।।
चीर कान्हा के बचाये ही बचेगी-
नीच दुःशासन कभी बचते नहीं।।
दंभ कितनों के महल को ढाह कर,
आजतक जीवंत कैसे दिख रहा।
देखिए जाकर शहर के दफ्तरों में,
बन विधाता भाग्य कैसे लिख रहा।।
आह की चिंगारियां जब जब उड़ीं –
ढेर राखों के सिवा दिखते नहीं।।
-उदयराज मिश्र
नेशनल अवार्डी शिक्षक




