
नमन है उस महापुरुष को,
जिनके शब्द नहीं शंखनाद थे
जो मौन रहे तो साधना बने,
जो बोले तो युग संवाद थे।
ग्रंथ नहीं, मानव पढ़ाया उन्होंने,
पीड़ा को पहला श्लोक किया
भूखे अधरों की करुण पुकार को
ईश्वर का साक्षात लोक किया।
“उठो, जागो” कोई नारा नहीं था,
वह सोई चेतना का आह्वान था,
दासता में जकड़ी आत्माओं को
स्वाभिमान का पहला ज्ञान था।
नारी में उन्होंने शक्ति देखी,
नर-नारी में भेद न माना,
श्रमिक के पसीने को
तपस्वी का अमृत जाना।
वेदांत उनके लिए दर्शन नहीं,
जीवन का जीवंत प्रमाण था।
हर धर्म हर सेवा से बढ़कर
भारत देश का दिल में स्थान था।
साहित्य उनके हाथों में
क्रांति का पावन अस्त्र बना।
शब्दों से उन्होंने नहीं लिखा,
अपने रक्त से भविष्य रचा।
जाति, पंथ, ऊँच-नीच से ऊपर
मानवता को उन्होंने स्थान दिया।
सेवा को साधना कहा स्वामी जी ने,
और कर्म को ही भगवान किया।
हे युगऋषि! हे राष्ट्रसंत!
आपकी ज्वाला आज भी जीवित है।
जब तक एक भी मनुष्य टूटेगा,
आपकी वाणी तब तक उपस्थित है।
ऋतु ऊषा राय ✍️✍️
आजमगढ़




