आलेख

सूर्य आराधना, सांस्कृतिक एकता और नव संकल्प का महापर्व: मकर संक्रांति

सुनील कुमार महला

 

सूर्य, संस्कृति और संकल्प का पर्व है मकर संक्रांति, जो हर वर्ष 14 जनवरी के दिन पूरे भारत में हर्षोल्लास और खुशी से मनाया जाता है। दरअसल, मकर संक्रांति सूर्य, पृथ्वी और ऋतुओं के बीच के संबंध को दर्शाने वाला पर्व है। वास्तव में यह पर्व हमें पर्यावरण संरक्षण, सामाजिक समरसता और स्वस्थ जीवनशैली का संदेश देता है। पाठक जानते होंगे कि इस दिन सूर्य देव धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश करते हैं। इसे सूर्य के उत्तरायण होने की शुरुआत माना जाता है। यह पर्व चंद्रमा नहीं बल्कि सूर्य की गति पर आधारित है। यहां पाठकों को बताता चलूं कि प्राचीन वैदिक काल में कृषि, ऋतु परिवर्तन और सूर्य की स्थिति के आधार पर ही पर्वों का निर्धारण किया जाता था और यही कारण है कि यह पर्व लगभग हर वर्ष एक ही तिथि को आता है। हालांकि, मकर संक्रांति कभी 13 जनवरी, कभी 14 तो कभी 15 जनवरी को भी पड़ती है। चूंकि यह सौर चक्र पर आधारित है, इसलिए हर साल सूर्य के राशि परिवर्तन में लगभग 20 मिनट का अंतर आता है और ​यही कारण है कि हर 80 साल में संक्रांति की तारीख एक दिन आगे बढ़ जाती है। मुगल काल में यह अक्सर 10-11 जनवरी को मनाई जाती थी। हमारे पौराणिक ग्रंथों ऋग्वेद और यजुर्वेद में सूर्य की उपासना और उत्तरायण को शुभकाल बताया गया है। मकर संक्रांति से दिन बड़े और रातें छोटी होने लगती हैं। दरअसल,मकर संक्रांति से सूर्य दक्षिणासनय से उत्तरायण की ओर बढ़ता है। इसका वैज्ञानिक कारण है। सूर्य धीरे धीरे उत्तरी गोलार्ध की ओर झुकता है, जिससे दिन बड़े और रातें छोटी होने लगती हैं।ज्यादातर लोग मानते हैं कि इस दिन से उत्तरायण शुरू होता है, लेकिन वैज्ञानिक दृष्टि से उत्तरायण 21 या 22 दिसंबर को ही शुरू हो जाता है। मकर संक्रांति वह दिन है जब सूर्य धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश करता है। वास्तव में, यह पर्व आत्मिक जागरण तथा सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक माना गया है।इस दिन गंगा, यमुना, गोदावरी जैसी नदियों में स्नान-दान का विशेष महत्व तथा तिल, गुड़, खिचड़ी और दान का विशेष धार्मिक मूल्य माना गया है।देखा जाए तो एक प्रकार से यह दान-पुण्य का पर्व है। कहते हैं कि महाभारत के भीष्म पितामह ने सूर्य के उत्तरायण होने का इंतज़ार किया और मकर संक्रांति के दिन ही देह त्यागी थी और यही कारण है कि इस दिन को मोक्षदायी माना जाता है। पौराणिक कथाओं में विवरण मिलता है कि भगवान सूर्य इस दिन अपने पुत्र शनि देव के घर (मकर राशि) जाते हैं। इसीलिए इस पर्व को पिता-पुत्र के संबंधों में मधुरता और सामाजिक समरसता का भी प्रतीक माना जाता है।यह भी मान्यता है कि इसी दिन(मकर संक्रांति के दिन) ही माता गंगा पृथ्वी पर अवतरित हुई थीं और इसलिए गंगा स्नान को अत्यंत पुण्यकारी माना गया है। पाठकों को जानकारी देना चाहूंगा कि दुनिया का सबसे बड़ा धार्मिक आयोजन, प्रयागराज का माघ मेला और कुंभ मेला, आधिकारिक तौर पर मकर संक्रांति के दिन ‘शाही स्नान’ के साथ शुरू होता है। माना जाता है कि इस दिन स्वर्ग के द्वार खुलते हैं और पवित्र नदियों में स्नान करने से पिछले जन्मों के पाप धुल जाते हैं। वास्तव में, यह पर्व फसल कटाई से जुड़ा हुआ है और हलधर नई फसल के लिए इस दिन भगवान सूर्य का आभार प्रकट करते हैं।इसी पर्व से यानी कि मकर संक्रांति से ही शीत ऋतु का अंत और वसंत ऋतु की शुरुआत होती है। तमिलनाडु में इसे(मकर संक्रांति) पोंगल, पंजाब में इसे लोहड़ी, गुजरात में इसे उत्तरायण, आंध्र प्रदेश में इसे भोगी पर्व, असम में माघ बिहू तथा पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार में इसे खिचड़ी पर्व के नाम से जाना जाता है। गौरतलब है कि ‘उत्तरायण’ के एक आधिकारिक उत्सव के रूप में गुजरात सरकार द्वारा वर्ष 1989 से अंतर्राष्ट्रीय पतंग महोत्सव का आयोजन किया जाता है। इस पर्व की खास बात यह है कि यह भारत का एकमात्र पर्व है, जिसकी तिथि लगभग स्थिर रहती है। इतना ही नहीं, प्राचीन काल में तो इसे नववर्ष के रूप में भी मनाया जाता था।इस पर्व पर तिल-गुड़ खाने के पीछे वैज्ञानिक कारण है। दरअसल ये हमारे शरीर में गर्मी बनाए रखते हैं और हमारी रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाते हैं। वहीं पर इस दिन पतंग उड़ाने की परंपरा सूर्य की किरणों से विटामिन-डी प्राप्ति से जुड़ी है। कहते हैं कि त्रेतायुग में भगवान श्री राम ने मकर संक्रांति के दिन ही पतंग उड़ाई थी, इसलिए तब से यह परंपरा पूरे देश में प्रचलित हो गई। उपलब्ध जानकारी के अनुसार मकर संक्रांति पर पतंग उड़ाने का वर्णन रामचरित मानस के बालकांड में मिलता है। तुलसीदास जी ने इसका वर्णन करते हुए लिखा है कि ‘राम इक दिन चंग उड़ाई, इंद्रलोक में पहुंची जाई।’ मान्यता है कि मकर संक्रांति पर जब भगवान राम ने पतंग उड़ाई थी, जो इंद्रलोक पहुंच गई थी। इतना ही नहीं,तमिल की तन्दनानरामायण में भी भगवान राम के पतंग उड़ाने का विवरण मिलता है।दरअसल,उस समय से लेकर आज तक पतंग उड़ाने की परंपरा चली आ रही है। इतना ही नहीं, भगवान कृष्ण के पतंग उड़ाने की परंपरा का उल्लेख भी भारतीय लोककथाओं और भजनों में मिलता है। दक्षिण भारत में तो इस दिन पशु-पक्षियों और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता व्यक्त की जाती है। जैसा कि इस आलेख में ऊपर भी चर्चा कर चुका हूं कि मकर संक्रांति को दान का महासंयोग माना गया है।इस दिन किया गया दान कई गुना फल देता है। ज्योतिषियों का कहना है कि इस बार यानी कि इस वर्ष (वर्ष 2026 में) मकर संक्रांति के अगले दिन यानी 15 जनवरी को शुक्र-शनि मिलकर लाभ दृष्टि योग का निर्माण करने वाले हैं। मकर संक्रांति पर यह संयोग करीब 100 वर्ष के बाद बन रहा है। मकर संक्रांति केवल एक पर्व नहीं, बल्कि सूर्य से जीवन, संस्कृति से संस्कार और परंपरा से प्रगति का उत्सव है। मकर संक्रांति अंधकार से प्रकाश की ओर बढ़ने का पर्व है। दूसरे शब्दों में कहें तो

यह हमें अंधकार से प्रकाश, निराशा से आशा और शीत से उष्मा की ओर ले जाने वाला पर्व है। तिल-गुड़ की मिठास हमें कटुता त्यागकर सौहार्द अपनाने की सीख देती है।यह पर्व नए आरंभ, मेहनत के सम्मान और सामाजिक एकता का प्रतीक है। मकर संक्रांति हमें याद दिलाती है कि जब दिशा सही हो, तो जीवन स्वयं उजास से भर जाता है।

सुनील कुमार महला, फ्रीलांस राइटर, कॉलमिस्ट व युवा साहित्यकार, पिथौरागढ़, उत्तराखंड।

मोबाइल 9828108858

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