साहित्य

खिचड़ी परब पे ग़ज़ल

अपूर्व नारायण तिवारी 'बनारसी बाबू'

हर साल मकर संक्रांति / ‘खिचड़ी महापर्व’ के मौके पर भारत की विविधतापूर्ण संस्कृति की झलक स्पष्ट दिखाई देती है, जहाँ पकवानों की रंगत बदलती रहती है, पर उत्सव का सार एक ही रहता है ।
इस बहुरंगी खिचड़ी परंपरा को समर्पित एक भोजपुरी ग़ज़ल यहाँ पर प्रस्तुत है  गजल।।

अजब छटा बाटे खिचड़ी के, भरल नेह से अंग-अंग,
भारत के हर कोने में, खावें जन-जन लेहले उमंग

कासी में उड़द दाल-नयका चाउर संग देसी घीउ के छौंका,
भंटा चोखा देवे सोंधाहट, मनवा भयल सभके मलंग

पंजाब में सरसों के साग संग, मक्के के रोटी करे मलंग,
गुजरात में तिल-गुड़, उड़त नील गगन में चंग पतंग

दक्खिन भारत में पोंगल, मीठ खीर के सुवाद करे दंग,
बिहार में चूड़ा-दही भोज, मनवा नाचे तिलकुट के संग

मूंग खिचड़ी,तुर दाल खिचड़ी,बाजड़ा खिचड़ी लावे उमंग,
काठियावाड़ी खिचड़ी,वाघरेली खिचड़ी लावे तरंग

वालचा खिचड़ी,मीठ खेचुड़ी, साबूदाना खिचड़ी के सत्संग,
पुणाग्राम खिचड़ी,आमिष खिचड़ी,
जा दोई,जदोह से जी सतरंग

ख़ारा पोंगल,वेन पोंगल,करिया चाउर खिचड़ी करै निहंग,
छिम्मी मटर के तहरी, मसालेदार खिचड़ी करत अभंग

खिचड़ी अनेक पर भाव एक हौ, एही से भारत हौ दबंग,
‘खिचड़ी’ महा परब मनावS, खावत सभे केहू करे सलंग
©अपूर्व नारायण तिवारी ‘बनारसी बाबू’

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