साहित्य

मेरा इश्क़

सुमन बिष्ट

मुझसे भी आगे बढ़ गया है
फ़साना मेरे इश्क़ का,
नज़र भर का ही रहा वो दीवाना मेरे इश्क़ का।

रात भर जागता रहा दिल, ख़ुद से ही बातें करती,
हर सन्नाटे ने पूछती फिर रही हूँ ठिकाना मेरे इश्क़ का।

वक़्त की गर्द में लिपट कर रह गई यादें सारी,
फिर भी मिटा न सका कोई निशान मेरे इश्क़ का।

सज्दों में भी माँगा मैंने तो बस ख़ामोशी ही मिली,
जैसे रब भी समझ न पाया हो तराना मेरे इश्क़ का।

दर-ब-दर भटकता रही मैं रूह का मुसाफ़िर बन,
हर सफ़र में तलाशती रही एक बहाना मेरे इश्क़ का।

लौट आओ तो सहेज लूँ तुम्हें साँसों की तरह,
अब भी खाली है दिल में वो ख़ज़ाना मेरे इश्क़ का।

कुछ दर्द ऐसे हैं जो आवाज़ नहीं करते,
आँखों से बहते अश्क़ कहते हैं फ़साना मेरे इश्क़ का।

लोग कहते हैं भुला दे,मगर कैसे भुला दूँ,
मेरी हर धड़कन है ख़ुद इक अफ़साना मेरे इश्क़ का।

“सुमन” ख़ुद को जला कर भी उजाला बाँटती रही,
यूँ ही मशहूर हो गया दीवाना मेरे इश्क़ का।

सुमन बिष्ट, नोएडा

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