साहित्य

धर्मराज युधिष्ठिर का अर्ध सत्य………….

आकाश शर्मा आज़ाद

गंगा पुत्र भीष्म ने जब कुरुक्षेत्र की भूमि पर,,
कुंती पुत्र अर्जुन के बाणों से, घायल होकर,,
बाणों की सैया पर विश्राम किया,,
अब आगे के युद्ध के लिए,,
किसे सेनापति के पद पर,,
नियुक्त किया जाए!
निराश कौरव सेना में यह प्रश्न उठा,,
दुर्योधन ने कौरव दल को,,
निराश देखकर,,
अपने हृदय को जरा समझा कर,,
कहां कौरव वीरों से,,
अभी भयभीत होने की कोई बात नहीं,,
कौरव दल मे, अब भी,,
वीरों की कोई कमी नहीं,,
अभी भी कौरव दल के,
पास गुरु द्रोण, अंगराज कर्ण,, कृपाचार्य,,
गुरु पुत्र अश्वत्थामा,,और शल्य जैसे,,
महावीर है मौजूद,,
विजय कौरव दल की होगी,,
है निराशा की कोई बात नहीं,,
सर्वसम्मति से फिर,,
गुरु द्रोणाचार्य को,,
कौरव दल का,, सेनापति चुना गया,,
सेनापति का पद ग्रहण करते ही,,
गुरु द्रोणाचार्य ने, धर्मराज युधिष्ठिर को,,
बंदी बनाने के लिए,
पांडवों को पराजित करने के लिए,,
चक्रव्यूह रचने की घोषणा की,,
चक्रव्यूह की घोषणा सुनके,,
खलबली मच गई
पांडवों के दल मे,,
क्योंकि मात्र एक अर्जुन को ही,,
चक्रव्यूह भेदना आता था!
पांडवों के दल में,,
और अर्जुन दूसरे छोर पर,,
युद्ध में व्यस्त थे,,
आपातकालीन सभा बुलाई गई,,
आज पांडवों के शिविर मे,,
चक्रव्यूह के संकट पर,,
विचार -विमर्श और
मंथन करने के लिए,,
धर्मराज युधिष्ठिर ने, सभा मे, कहा,,
चक्रव्यूह संकट पर
चिंता व्यक्त करते हुए,,
गुरु द्रोणाचार्य ने, चक्रव्यूह की,,
की हैं घोषणा
परंतु अब कौन करेगा
पांडव सेना की ओर से,,
गुरु द्रोणाचार्य के चक्रव्यूह का सामना,,
एकमात्र अर्जुन के सिवा,,
पांडवों में किसी को चक्रव्यूह
भेदना आता ही नहीं,,
और अर्जुन है यहां मौजूद नहीं,,
शिविर मे सभी को चिंता में देखकर,,
बोला,,वीर अभिमन्यु बालक
चिंता की कोई बात नहीं,,धर्मराज
मै, करूंगा चक्रव्यूह में प्रवेश
लेकिन,हाँ मुझे मात्र
चक्रव्यूह में प्रवेश का ज्ञान है
बाहर आने का ज्ञान नहीं,,
मैंने, अपनी माता के,
गर्भ मे,अपने पिता से
सुना था यह संदेश,,
सभी ने कहा,
हमारे पास अभिमन्यु को,,
चक्रव्यूह में भेजने के अलावा,,
और कोई मार्ग नहीं,,
तब योजना बनी,,की
भीम,नकुल,सहदेव
अभिमन्यु के पीछे रहेंगे,,
उसकी रक्षा के लिए,,
किंतु जयद्रथ ने,,
पांडवों का मार्ग रोक दिया,,
और अभिमन्यु चक्रव्यूह में,,
अकेला कर गया प्रवेश,,
चक्रव्यूह में, प्रवेश करते ही,,
अभिमन्यु का सामना द्रोणाचार्य से हुआ,,
अभिमन्यु ने, अपनी वीरता से,,
गुरु द्रोणाचार्य को परास्त कर,,
आगे का मार्ग प्रशस्त किया,,
क्या कृपाचार्य, क्या अंगराज कर्ण,
क्या शल्य, अर्जुन के पुत्र ने आज,
अपनी एकाग्रता से,
सबको पराजित किया था
अभिमन्यु आज अपने
प्राण हथेली पर लेकर,,
रणभूमि में उतरा था,,
वीर अभिमन्यु ने,,
आज रणभूमि में महाकाल का,
रूप धारण किया था,,
दुर्योधन के पुत्र लक्ष्मण को,,
अपने बाणों से,
अभिमन्यु ने यमलोक यात्रा पर,
भेज दिया!!
तथा शल्य के, पुत्र,,रुक्मरथ
का भी अंत किया !!
बृहद्बल कोशल के राजा।
को, भी अभिमन्यु ने,
यम का द्वारा दिखाया
दुःशासन के पुत्र
दौश्शासनि को,
भी, अभिमन्यु ने मृत्यु के घाट पर,
उतार दिया !!
अभिमन्यु ने अपनी वीरता से,
चक्रव्यूह के छह द्वारों को पार किया,,
परंतु सातवें द्वार पर,
कौरव महारथियों ने,
छल से अभिमन्यु को,,
मृत्यु की गोद में सुला दिया,,
आज धर्म की विजय हुई थी,,
आज वीरता अपने सर्वोच्च शिखर को,,
प्राप्त हुई थी,,
अर्जुन को ज़ब,,
अभिमन्यु की मृत्यु का समाचार मिला !
तो, अर्जुन के क्रोध का, ज्वालामुखी फूट पड़ा
अर्जुन ने ली प्रतिज्ञा,,
कि कल जयद्रथ की जीवन का,,
अंतिम दिन होगा !
यदि कल मैं सूर्यास्त तक
जयद्रथ का, वध,
नहीं कर पाया तो,,
मेरा अग्नि स्नान होगा
ये,गांडीव धारी,
अर्जुन की अखंड है प्रतिज्ञा
ज़ब कौरव को,,
अर्जुन की प्रतिज्ञा के बारे में ज्ञात हुआ !!
तो, जयद्रथ बहुत भयभीत हुआ,!!
तब सेनापति गुरु द्रोणाचार्य ने,,
सिंधु नरेश जयद्रथ को,,
रक्षा का वचन दिया !!
दुर्योधन ने जयद्रथ की सुरक्षा के लिए,,
जयद्रथ के चारों ओर एक घेरा बनाया,,
और गुरु द्रोणाचार्य ने,अपने दल के,
श्रेष्ठ योद्धाओं को जयद्रथ की सुरक्षा के लिए तैनात किया !!
सूर्य की पहली किरण के साथ,,
जब युद्ध आरंभ हुआ,,
तो अर्जुन ने एक प्रचंड रूप
महाकाल का चंड रूप धारण किया !!
आज अर्जुन के तीरों का सामना
कोई नहीं कर पा रहा था,,
आज अर्जुन का क्रोध रणभूमि,,
अग्नि के रूप में बरस रहा था
द्रोणाचार्य, कृपाचार्य
अंगराज कर्ण
आज अर्जुन के हाथों से,,
सब परस्त हुए,,
फिर भी पांडवों का भय बढ़ता जा रहा था,,
क्योंकि सूर्यास्त अब निकट था,,
धर्मराज युधिष्ठिर को,,
अर्जुन की मृत्यु का,,
भय सता रहा था,,
जब जयद्रथ हाथ ना आया,,
श्री कृष्ण ने तब अपना चमत्कार दिखाया
श्री कृष्ण ने अपनी माया से,,
सूर्यास्त होने का भ्रम उत्पन्न किया
कौरवों को, लगा उन्होंने यह युद्ध जीत लिया !!
कौरवों ने अर्जुन की मृत्यु का उत्सव,,
आरंभ किया
पांडव बड़े निराशा हुए,,
अर्जुन ने स्वयं अपनी चिता का
प्रबंध किया !!
जयद्रथ भी अर्जुन की मृत्यु को,
देखने के लिए, प्रकट हुआ,,
तभी अचानक एक चमत्कार हुआ
सूर्य न जाने अंबर में,,
कहां से प्रकट हुआ
श्री कृष्ण ने कहा अर्जुन से,,
ठहरो, अर्जुन देखो सूर्यास्त
अभी नहीं हुआ है,,
और जयद्रथ तुम्हारे सामने खड़ा है,,
हे, अर्जुन मृत्यु का विकल्प त्याग दो,,
तथा अपनी प्रतिज्ञा की तरफ ध्यान दो
सुनो अर्जुन तुम पाशुपतास्त्र का,
प्रयोग करो और
जयद्रथ को मृत्यु के घाट उतार दो,,
बस इतना रहे ध्यान
जयद्रथ का शीश,,
उसके पिता के चरणों में गिरे,,
अर्जुन ने श्री कृष्ण की आज्ञा का
पालन किया
जयद्रथ को यम की गोद में सुला दिया,,
इस पराजय से दुर्योधन,,
बहुत क्रोधित हुआ,,
और द्रोणाचार्य पर,,
पक्षपात का आरोप,,
लगाते हुए दुर्योधन ने कहा,,
गुरुवर आप चाहते ही नहीं है,,
कौरव दल की विजय
आपको आरंभ से ही,,
पांडव अति प्रिय है
दुर्योधन का आरोप सुनकर,,
गुरु द्रोणाचार्य हुए क्रोध से लाल,,
तथा सेनापति गुरु द्रोणाचार्य ने अंतिम
युद्ध करने की,,
प्रतिज्ञा लेते हुए कहा,,
जब तक मैं,,
समस्त पांडवों को,,
मृत्यु के घाट नहीं उतार दूंगा,,
तब तक मैं द्रोणाचार्य,,
अपना कवच नहीं उतारूंगा,,
यह मेरी अंतिम प्रतिज्ञा है,,
द्रोणाचार्य की प्रतिज्ञा सुनकर,,
पांडवों की पक्ष में मातम छा गया
पांडवों ने कहा,,
अब तो युद्ध में हमारी विजय,,
संभव ही नहीं है,,
तब श्री कृष्ण ने कहा,,
उपाय है,,
यदि धर्मराज युधिष्ठिर चाहे तो,,
पांडवों की विजय संभव है,,
पांडव दल में, एक हाथी है,,
अश्वत्थामा नाम का,,
यदि भीम भैया,,
उसकी मृत्यु कर दें,,
और धर्मराज युधिष्ठिर,,
गुरु द्रोणाचार्य से,,
ये कहे कि,,
अश्वत्थामा मारा गया,,
तो गुरु द्रोणाचार्य,,
अपने शस्त्र त्याग कर,,
पुत्र प्रेम मे,,
शुद्ध बुद्ध खो बैठेंगे,,
इसी अवसर का लाभ उठाकर
सेनापति धृष्टद्युम्न द्रोणाचार्य की हत्या कर,,
अपनी प्रतिज्ञा अपना प्रतिशोध,,
पूरा कर लेंगे,,
मात्र यही एक पांडवों की विजय का मार्ग है
यह सुनकर धर्मराज युधिष्ठिर ने कहा,,
आप तो जानते हैं केशव,,
मैं,असत्य नहीं कहता,,
नहीं धर्मराज असत्य
नहीं कहना है आपको,,
धर्म की विजय के लिए
मात्र एक छोटा सा ,,
अर्ध सत्य कहना हैं,,
आपको,,
हम जानते हैं,,
गुरु द्रोणाचार्य, मात्र एक
आपका ही यकीन करेंगे
जब गुरु द्रोणाचार्य आपसे प्रश्न
करेंगे ,,
आपको इतना ही कहना है
अश्वत्थामा मारा गया,,
बाकी की बात पर,,
पांडव मेरे एक इशारे पर
शंख की तीव्र ध्वनि करेंगे,,
अब धर्म की विजय,,
धर्मराज आपके अर्ध सत्य पर निर्भर है,,
धर्मराज राजी हो गए,,
धर्म की विजय के लिए,,
अर्ध सत्य कहने को,,
युद्ध जब प्रारंभ हुआ,,
गुरु द्रोणाचार्य ने भी,,
मृत्यु का महा तांडव आरंभ किया
तो,, पांडवों ने भी अपनी योजना पर कार्य
किया
महाबली भीम ने ले लीए,,
अश्वत्थामा नामक हाथी के प्राण
पांडव पक्ष ने,,
मिथ्या उत्सव मनाना,,
आरंभ किया
मच गया शोर रणभूमि में,,
अश्वत्थामा मारा गया,,अश्वत्थामा मारा गया
इस ध्वनि से विचलित होकर,,
प्रश्न किया धर्मराज युधिष्ठिर से,,
जरा निकट जाकर,,
क्या मेरा पुत्र अश्वत्थामा
मारा गया धर्मराज
धर्मराज ने धर्म की खातिर,,
आज प्रथम बार अर्ध सत्य कहा,,
हाँ ये, सत्य है गुरु द्रोणाचार्य
अश्वत्थामा मारा गया
महाबली भीम ने,,
अभी-अभी उसके प्राण लिए हैं,,
बस इतना ही सुना गुरु द्रोणाचार्य,,
पांडवों ने कृष्ण के एक इशारे पर,,
विजय का शंख बजा दिया
गुरु द्रोणाचार्य ने अपने शस्त्र त्याग
दिए,,
और अचेत हो गए,,
इस अवसर का लाभ उठाकर,,
सेनापति धृष्टद्युम्न ने भी,,
गुरु द्रोणाचार्य का वध करके,,
अपना प्रतिशोध पूर्ण किया,,
इस धर्म युद्ध में,,
धर्मराज युधिष्ठिर के एक
अर्ध सत्य ने,,
आगे चलकर,
धर्म की विजय का मार्ग
प्रशस्त किया !!

आकाश शर्मा आज़ाद

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