साहित्य

50-60 का दशक-अतीत की सैर का पार्ट-1

ज्ञान विभूषण डॉ. विनय कुमार श्रीवास्तव

उस बचपन को धन्यवाद है,मैं उसका हूँ आभारी।
50-60 के दशक दौर का,मैं दिल से हूं आभारी।।

वो दौर लौट कर न आएगा,उसका मैं हूँ आभारी।
दिया खुशी जो बचपन में,उसका बहुत आभारी।।

गर्मी में रूहअफजा शरबत,पीना व एनर्जी लेना।
याद है नींबू-चीनी-पानी का,भी ये शरबत लेना।।

गुड़ खाकर जल पीना,इसे स्वास्थ्य हित में लेना।
खेल में चोट से खून बहे,दूध-फिटकरी भी लेना।।

वाशिंग मशीन नहीं थी,हाथों से कपड़े धोना भी।
दीवारों में लगते देखे थे,तब काफी ये लोना भी।।

कपड़ों में नील-टिनोपाल,से चमक का देना भी।
कच्ची दीवारों पर मिट्टी-गोबर,से लेपन देना भी।।

दरवाजे बाहर दुवार में झाड़ू,रोज सुबह लगाना।
गाय-भैंस के गोबर पलरी से,प्रातः सायं हटाना।।

लालटेन चिमनी में पढ़ना,ढिबरी दिया जलाना।
दीवट ताख दिया रखना,वोसारे में भी जलाना।।

मिट्टी तेल चिमनी ढ़िबरी,लालटेन में डलवाते थे।
शाम पूर्व लैंप-लालटेनों के,शीशे ये चमकाते थे।।

शाम होते बड़े बूढों के बिछौने,ये रोज लगाते थे।
सुबह भोर में रोज बिछौना,कैसे सभी हटाते थे।।

बिस्तर से उठने के पहले,प्रभु सुमिरन भी होता।
बड़ों के पैर छूकर उनके,आशीष भी लेने होता।।

तुरंत बाद हाथों में होते थे,पानी भरा यह लोटा।
फारिग होने को जाते थे,बैठें बस खोल लंगोटा।।

हाथ-लोटे को मिट्टी-राख,साबुन से चमकाते थे।
नीम बबूल की दातूनों से,दाँतों को चमकाते थे।।

दुवार मोहार चबूतरे को,झाड़ू लगा चमकाते थे।
खेत व खलिहानों में भी,कुछ काम करवाते थे।।

कुछ एक्सरसाइज वर्जिश,करते थे दंड भांजते।
बाबा-दादी बुआ चाचा,माँ-बाप को सब मानते।।

फूल तोड़ते पूजा वास्ते,पूजन का बर्तन मांजते।
थोड़ा सरसो तेल लगा शरीर में,मांजते-भांजते।।

रस्सी बाल्टी लेकर फिर,कुएं से पानी भरते थे।
ठंड में गर्म गर्मी में ठंडे,पानी से स्नान करते थे।।

पूजा का किवाड़ खोलते,प्रभु पूजा ये करते थे।
चंदन घिस लगा धूप दीप दे,चालीसा पढ़ते थे।।

पूजा पाठ से निवृत्त होकर,नाश्ता हम थे करते।
स्कूल के मिले काम सभी,पूरा उसको थे करते।।

स्कूल बस्ता में कापी किताब,लगा फिट करते।
खाना खाएँ टिफिन रखें,कपड़े ये पहना करते।।

पैदल या सायकिल से सब,स्कूल जाया करते।
स्कूल हाजिरी देने बाद,प्रार्थना पीटी थे करते।।

कक्षा सहपाठी संग,गुरुओं से हर विषय पढ़ते।
इंटरवल में लंच करें,कुछ खेला कूदी थे करते।।

सायं घर लौटने पर माँ,कुछ न कुछ खिलाती।
बाबू काम से लौटें तो,घर में रौनक बढ़ जाती।।

दशहरा-दिवाली मिठाई,जलेबी भी थी आती।
नई फसलें तैयार हों तो,नवान्न पूजे की जाती।।

गाँव के साथी बच्चों संग,सभी थे खेला करते।
कुछ देर नीम-पीपल,चबूतरे पर थे बैठा करते।।

थक जाने पर कुछ देर,हम सुस्ताया थे करते।
खेत-खलिहानों में,दंवरी एवं मड़ाई थे करते।।

ज्ञान विभूषण डॉ. विनय कुमार श्रीवास्तव
वरिष्ठ प्रवक्ता-पीबी कालेज,प्रतापगढ़ सिटी,उ.प्र.
(शिक्षक कवि लेखक साहित्यकार समीक्षक एवं समाजसेवी)

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