साहित्य

मजबूर है जनता की सरकार

उदय किशोर साह

भ्रष्टाचारी तुमको है    अब धिक्कार
हर दफ्तर में तेरी खुद की है सरकार
देश की जनता की  नजर में हो गद्दार
मजबूर है जनता की चुनी हुई सरकार

बिना रिश्वत के फाईल को ना बढ़ाता
बेईमानी कर हर काम को    निभाता
तेरे इस पाप  में सहयोगी भी मक्कार
मजबूर है जनता की चुनी हुई सरकार

महल पे महल है     तेरा      आशियाना
गरीबों को ना नसीब है कोई भी ठिकाना
करते हो तुम कुरसी का हर वक्त अहंकार
मजबूर है जनता की चुनी हुई     सरकार

विदेशों में तेरे लाड़ले उच्च शिक्षा  पाते
रंक के नावालिग बाल मजदूर कहलाते
कितना अन्तर है देश में आज बरकरार
मजबूर है जनता की चुनी हुई  सरकार

देश में कहने का है आज        लोकतंत्र
पर अन्तर प्रवाह में दिखता भ्रष्ट का मंत्र
कैसे तेरा हो सटीक सा कोई      उपचार
मजबूर है जनता की चुनी हुई     सरकार

उदय किशोर साह
मो० पो० जयपुर जिला बांका बिहार

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