
जर्मनी के प्रसिद्ध दार्शनिक शॉपेन हावर का एक प्रसिद्ध वचन है “-प्रत्येक व्यक्ति जन्मजात दार्शनिक है।” आइए जीवन दर्शन को समझने के लिए हमें इस वचन के अर्थ को विस्तार से जानना होगा । कोई व्यक्ति जिस जाति, धर्म ,वर्ण, देश तथा भौगोलिक परिस्थितियों में जन्म लेता है, उसी के अनुरूप उसके विचार परिपक्व होते हैं। अर्थात इन परिस्थितियों में जन्मे व्यक्ति के विचारों पर उसकी सामाजिक आर्थिक तथा भौगोलिक परिस्थितियों का अत्यधिक प्रभाव होता है। प्रत्येक देश तथा धर्म में अलग-अलग भाषा,संस्कृति तथा परंपराएं हैं; जो कि उनमें जन्मे व्यक्ति के व्यक्तित्व का सहज रूप से अभिन्न अंग हो जाती हैं। उसी के अनुरूप वह अपने जीवन में व्यवहार को अपनाता है तथा वहां की स्थिति के अनुरूप कानून एवं मर्यादा का भी पालन करता है। इस प्रकार इन सारे कारकों से मिलकर उसके जीवन-दर्शन का निर्माण होता है। इस प्रकार प्रत्येक व्यक्ति जन्मजात दार्शनिक हुआ। यदि दूसरे अर्थ में समझें तो प्रकृति ने मनुष्य को बुद्धि प्रदान की है। और उस बुद्धि का कार्य है, तर्क- वितर्क करना, उचित -अनुचित का ज्ञान करना। उपयुक्त को अपनाकर अनुपयुक्त को त्यागना। प्रत्येक व्यक्ति में बुद्धि के तत्वों का निर्माण जन्मजात रूप से होता है। जो अपने उपयुक्त परिस्थितियां,उचित संस्कार एवं शिक्षा पाकर बलवती होती है। एक बीज अपने में अनंत संभावनाएं छुपाये रहता है; यदि उस बीज को उर्वर भूमि में रोप दिया जाए एवं यथा समय उसको पानी, खाद से पोषित किया जाए तो वह एक बड़े वृक्ष के रूप में तब्दील हो सकता है, ठीक उसी प्रकार मनुष्य की बुद्धि है यदि उसे उच्च शिक्षा-दीक्षा, चिंतन-मनन का उपयुक्त अवसर मिले तो वह सूक्ष्म होकर गहन विषयों का विश्लेषण करने लगती है और तथ्यों के अंदर छुपे सत्य का प्रकटीकरण करने लगती है। इस प्रकार अध्ययन-मनन-चिंतन तथा शिक्षा-दीक्षा से बुद्धि तीक्ष्ण होकर विश्लेषणात्मक कार्य करने लगती है। इस प्रकार विश्लेषण करने का कार्य किसी दार्शनिक का ही होता है। इस अर्थ में भी प्रत्येक व्यक्ति जन्मजात दार्शनिक हुआ।
वास्तव में शिक्षा और दर्शन एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। और दोनों ही अभिन्न रूप से संयुक्त हैं। शिक्षा जीवन में दीपक की भांति है जो व्यक्ति को अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाती है। इसीलिए वेदों के ऋषियों ने प्रार्थना की “तमसो मा ज्योतिर्गमय”। शिक्षा जीवन को उज्जवल बनाती है, वहीं शिक्षा जीवन का दर्शन भी हमें समझाती है। शिक्षाविदों ने कहा है, दर्शन शिक्षा के उद्देश्यों को निर्धारित करता है तथा शिक्षा उन उद्देश्यों को प्राप्त करने का प्रयास करती है। अतः दर्शन जीवन का सैद्धांतिक और शिक्षा इसका व्यावहारिक पक्ष है। जीवन का ऐसा कोई भी पक्ष नहीं जो शिक्षा से प्रभावित न होता हो। शिक्षा जीवन की दिशा और दशा दोनों ही तय करती है और शिक्षा को जो निश्चित ढांँचे में ढालता है ,वह है दर्शन। शिक्षा की महत्ता को तो जीवन के लिए हम सब ने आवश्यक मानकर स्वीकार किया ही है। अब प्रश्न उठता है कि दर्शन की जीवन में क्या आवश्यकता है?
वैसे साधारण रूप में समझें तो दर्शन का कार्य क्षेत्र ईश्वर, आत्मा, कर्म ,लोक, परलोक इत्यादि रहा है। इन अबूझ प्रश्नों का उत्तर दर्शन वर्षों से खोजता रहा है। जीवन जितना सहज और सरल दिखाई पड़ता है, असल में उतना है नहीं। इस दृश्य जगत, इस संसार में बहुत कुछ ऐसा भी है जो अदृश्य और अबूझ है। जिसको सामान्य मनुष्य सहजता के साथ नहीं समझ सकता ।ऐसे असहज प्रश्नों का उत्तर ढूंढने का कार्य दर्शनशास्त्र करता रहा है? मनुष्य के मन में भी सदा से ही परलोक के संबंध में आत्मा, ईश्वर के संबंध में अनेक प्रकार के प्रश्न उठते रहे हैं। प्रत्येक दर्शन ने उसको सुलझाने का प्रयास अपने-अपने अनुसार किया है।
भारत में इस संबंध में दर्शनों की लंबी श्रंखला है।भारत में विशेष रूप से षडदर्शनों की बात कही जाती है और उन दर्शनों के बाद अनेक मत, संप्रदाय और संप्रदायों से उप संप्रदायों का जन्म होता रहा । समय-समय पर जिन दार्शनिकों का धरा पर अवतरण हुआ। उन्होंने अपने ज्ञान के अनुरूप इन समस्याओं को सुलझाने का प्रयास किया। इसलिए दार्शनिकों की एक लंबी श्रंखला में एक ही प्रश्न के कई उत्तर प्राप्त होते हैं। गणित के जैसे किसी सर्वमान्य उत्तर की अपेक्षा दर्शन से नहीं की जा सकती। इसको जितना ही सुलझाने की चेष्टा की जाती है ,यह उतना ही उलझता चला जाता है। वास्तव में यह सारे विषय इंद्रियातीत हैं। जिनका स्पष्ट रूप में हांँ या नहीं में उत्तर नहीं दिया जा सकता। इन अबूझ प्रश्नों के उत्तरों को ढूंँढते -ढूंँढते एक समय ऐसा भी आया ,जब सभी दार्शनिक मानव जीवन की वास्तविक समस्याओं को भूल बैठे और काल्पनिक प्रश्नों के उत्तर ढूंँढने में लगे हुए थे। लोगों का जीवन नीरस होता जा रहा था, लोग अपने जीवन की समस्याओं से जूझ रहे थे। तब कुछ ऐसे दर्शनों का उद्भव हुआ जो मानव जीवन की समस्याओं से सीधे संबंधित थे ,जो परलोक की बात न करके इहलोक की बात करते थे। जो गौतम बुद्ध और महावीर स्वामी जैसे महान विचारकों की विचारणाएं थी। जिनको श्रमण परंपराएंँ या श्रमण संस्कृति कहा गया। वेदों ने इन्हें अवैदिक दर्शन या नास्तिक दर्शन तक भी कहा।
इन दार्शनिकों ने वर्षों से चले आ रहे दार्शनिक प्रश्नों को दरकिनार करते हुए जीवन की वास्तविक समस्याओं पर ध्यान केंद्रित किया और बताया कि मनुष्य कैसे दुख से मुक्त हो सकता है? ईश्वर ,आत्मा इत्यादि प्रश्नों को गौण मानकर सीधे-सीधे मानव जिनसे जूझ रहा था और उनसे मुक्ति की रहा देख रहा था; इन्होंने उन्हीं की बात की और लोगों से सीधे जुड़े। अर्थात इन दर्शनों ने परलोकवाद के स्थान पर यथार्थवाद को महत्व दिया। उनके वचनों का प्रभाव जन सामान्य पर पड़ा और मनुष्य यथार्थ जगत की बात करने लगा; समस्याओं को यथार्थ रूप में देखने लगा। गौतम बुद्ध ने कहा दुख का कारण अविद्या या अज्ञान है ,उसको जानकर ही दुख से मुक्ति पाई जा सकती है। उन्होंने अप्प दीपो भव की बात कही । और बताया मनुष्य केवल स्वयं के गलत कर्मों के कारण दुखी है, इसका कोई अन्य कारण नहीं है, इसलिए इन दुखों से मुक्ति भी हम स्वयं ही पा सकते हैं। एक अर्थ में मनुष्य अपने भाग्य का स्वयं निर्माता है।
समय-समय पर समाज में नई-नई विचारधाराओं नए-नए दर्शनों का उद्भव होता रहा है। जिनका उद्देश्य सिद्धांतों को वास्तविक व्यवहारिकता के धरातल पर लाना है। उन सिद्धांतों को उपयोगी बनाना है और जो अनुपयोगी हो गए हैं, उनको छोड़ना है। प्राचीन परंपराएंँ जब दुष्परंपराओं का रूप ले लेती हैं या रूढ़िवादियांँ बन जाती हैं; उसके बाद भी जन सामान्य उनको अपनाये रहता है और समाज निरंतर गर्त की ओर जाने लगता है । उन्नति के स्थान पर यह सब साधन अवनति के कारण बन जाते हैं। इसलिए धर्म- दर्शन तथा अन्य सिद्धांतों को सामयिक बनाने की सदैव ही आवश्यकता होती है।
जैसे कि पूर्व में कहा गया है व्यक्ति का जीवन और उसके विचारधारा उन भौगोलिक परिस्थितियों,उस जाति और धर्म से प्रभावित रहती हैं जिसमें उसका जन्म हुआ है। और ज्यादातर व्यक्ति जीवन के इस बने बनाये दायरे में ही रहना पसंद करतें हैं। इसका अतिक्रमण कर बाहर नहीं निकल पाते ,इसलिए अपने ज्ञान का विस्तार भी नहीं कर पाते हैं। इसी कारण एक सामान्य व्यक्ति का जीवन दर्शन भी प्राय: संकुचित ही देखा गया है। कभी उसका जीवन दर्शन राजनीति से प्रेरित होता है तो कभी प्राचीन धार्मिक रूढ़ियों और परंपराओं से। आधुनिक युग में जब निरंतर परिवर्तन की हवा चल रही है ,तकनीकी और वैज्ञानिक ज्ञान में रोज परिवर्तन हो रहा है। प्राचीन और नवीन ज्ञान में टकराव की स्थिति है। नवीन ज्ञान तथा विज्ञान को न अपनाने के कारण सारे विश्व में पिछड़ने का डर है; तब भी अपनी पुरानी परंपराओं से चिपके रहना और उन्हीं को सर्वश्रेष्ठ घोषित करना अज्ञानता की निशानी है। कहते हैं जहां भी श्रेष्ठ विचार, श्रेष्ठ सिद्धांत और श्रेष्ठ जीवन शैली मिले, उसको हमें अपनाना चाहिए। किंतु इसमें विवेक का स्थान भी महत्वपूर्ण है। जैसा कि गौतम बुद्ध कहते हैं किसी बात को सिर्फ इसलिए मत मान लेना कि वह शास्त्रों में कही गई है या आपके बड़े बुजुर्ग ऐसा कहते रहे हैं बल्कि उसको अपने विवेक की कसौटी पर कसना चाहिए और यदि आपको उपयुक्त लगे तभी उसको अपनाना चाहिए।
दर्शन का विषय इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि यह व्यक्ति के अंतर्मन को ,विचारों को और तदनुरूप उसकी क्रियाओं को सदैव ही प्रभावित करता है।
ऐसा संभव है जितने व्यक्ति हों उतने ही दर्शन भी हो सकते हैं। प्रत्येक व्यक्ति के जीवन पर किसी न किसी विशिष्ट विचार ,विशिष्ट दर्शन या विशिष्ट महापुरुष का प्रभाव अवश्य होता है। उन्ही सिद्धांतों के अनुरूप, उन्ही आदर्शों के अनुरूप वह व्यक्ति अपना जीवन संचालित करता है,अपने जीवन के नियम कायदे बनाता है, मर्यादाएं ,सीमाएं तय करता है और उसके अनुसार व्यवहार करता है। इन्हीं विचारणा या दर्शन के कारण कोई व्यक्ति ईमानदारी को अत्यधिक महत्व देता है तो कोई व्यक्ति बेईमानी करने से भी नहीं चूकता। किन्हीं के लिए आदर्शवादी विचार सत्यनिष्ठा, विवेकशीलता किताबी बातें हैं, तो किन्हीं के लिए यह पूरा जीवन है। कुछ व्यक्ति येन- केन प्रकारेण लाभ कमाना चाहते हैं,जबकि अन्य व्यक्ति अपने मूल्यों की तलांजलि देकर भी अनैतिक लाभ कमाना नहीं चाहता। कुछ व्यक्ति धन को साध्य समझते हैं ,अन्य उच्च आदर्शवान व्यक्ति धन को मात्र साधन समझता है। जिस व्यक्ति का जीवन दर्शन विकृत होगा वह छोटे मूल्यों को अपनाता है प्रारंभ में भले ही उसे वह सुख कारक प्रतीत हों परंतु अंत में दुखदाई ही होते हैं।
परिवर्तन के इस चक्र में दर्शन ने भी अपने क्षेत्र का विस्तार किया है ।आज का दर्शन केवल आध्यात्मिक समस्याओं को सुलझाने में ही रत नहीं है ,बल्कि उसने अपना दायरा सामाजिक समस्याओं ,व्यक्ति के जीवन, राजनीति तक भी विस्तृत किया है। दर्शन के क्षेत्र में सामाजिक दर्शन के नाम से कई सारी नवीन विचारधाराओं को स्थान दिया गया है। जिन्होंने किन्हीं न किन्ही रूप में समाज को प्रभावित किया है। दर्शन में जहां अतिमानस का प्रयोग करने वाले महर्षि अरविंद सम्मिलित हैं ,वही सामाजिक और राजनीतिक जीवन में देश को नयी दिशा देने वाले मोहनदास करमचंद गांधी भी। सामाजिक बुराइयों के खिलाफ डटकर खड़े और अपनी हक की आवाज उठाते डॉक्टर अंबेडकर भी दर्शन को रेखांकित करते हैं, तो अल्लामा इकबाल ,जिद्दू कृष्णमूर्ति, डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन भी दर्शन को मजबूती प्रदान करते हैं।
यदि धर्म दर्शन की बात करें तो दोनों में अटूट संबंध दिखाई देता है। दोनों ही जीवन को गहरे तल तक प्रभावित करते हैं। धर्म जिस कारण लोगों की जीवन शैली बनता है उसके पीछे दर्शन की ही वैज्ञानिकता काम करती है। दर्शन यदि अपने आधार छोड़ दे तो धर्म निश्चित रूप से धराशाई हो जाएगा। दर्शन और धर्म में यही अंतर है कि दर्शन में कभी पाखंडवाद, आडंबरवाद, अवैज्ञानिकता, सामाजिक बुराइयां अपना स्थान नहीं बना पाती ,जबकि धर्म समय पर इन बुराइयों में उलझ कर रह जाता है। तब हमें धर्म के दार्शनिक आधार को ढूंढना आवश्यक हो जाता है। जिससे धर्म अपनी परिपक्व रूप में पुनः प्रकट हो सके। जिस धर्म की दर्शन और विज्ञान से घनिष्ठता रहेगी, वही केवल कल्याण का मार्ग दिखा सकता है। इसलिए दर्शन धर्म को एक वैज्ञानिक आधार प्रदान करता है। दर्शन केवल उन्हीं तथ्यों को मानता है जिनको तर्क के द्वारा स्पष्ट किया जा सके, जिसका निषेध संभव न हो। इसी प्रकार विज्ञान भी उन सार्वभौमिक सत्य को मानता है जिनको प्रयोगशाला में सिद्ध किया जा सके या जिनका प्रत्यक्ष किया जा सके। दर्शन और विज्ञान कहता है केवल सार्वभौमिक सत्यों को ही स्वीकार किया जाना चाहिए। जिस प्रकार से गणित के ज्ञान में दो और दो चार होते हैं। वह विश्व के हर कोने में समान मापदंड है। इसलिए धर्म में भी इसी प्रकार की सार्वभौमिकता आवश्यक है ताकि विश्व धर्म और विश्व शांति के मार्ग पर आगे बढ़ जा सके। इसलिए दर्शन सदैव जीवन को बेहतर बनाने की ओर प्रयासरत रहता है और धर्म में वैज्ञानिकता का बीजारोपण करता है; इसलिए दार्शनिक पृष्ठभूमि छोड़ने का अर्थ है धर्म का धीरे-धीरे रसातल में चले जाना। इसलिए जन सामान्य को भी धर्म के पीछे के दार्शनिक आधारों को न केवल जानना ही चाहिए बल्कि अपनाना भी चाहिए। इससे धर्म में अराजक तत्वों का प्रवेश कभी भी न हो सकेगा और धर्म सदैव ही सामान्य मनुष्य के लिए प्रकाश बनकर जीवन का मार्ग दिखाता रहेगा।
डॉक्टर संदीप कुमार सचेत
संभल ,उत्तर प्रदेश
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