साहित्य

कोहरे की चादर

बेख़ौफ़ शायर डा.नरेश सागर

शीत ऋतु में जाड़े का, जुल्म बढ़े बड़ा भारी
कोहरे की चादर में ,अक्सर बढ़ती मारा मारी
शीत ऋतु…….

आलस सब पर छा जाता है, लगे रजाई अच्छी
ठंड तोड़ देती है लोहा, बात लगे ये सच्ची
चाय की चुस्की लाती फुर्ती, साग लगे हैं अच्छा
छुट जाती है दावत कितनी, छूट जाती है यारी
शीत ऋतु………

सड़कों पर ये धुंध की चादर, सबको खूब डराती
बुढ़े जवान और बच्चों को, मैया याद दिलाती
घर में कैद कर देता कोहरा, आग देख ललचाता
सूरज की गर्मी पर भी ये,कोहरा पड़ता भारी
शीत ऋतु………

अलाव जलाकर सब मिल बैठे, करते याद पुरानी
सुनी – अनसुनी बात को लेकर, छेड़े राम कहानी
धुक-धुक करती रेल हमारी, आती देरी से
बूढ़े और बच्चों के लिए ये, बन कर आती बीमारी
शीत ऋतु…….

सड़कों पर धीरे-धीरे चलना, मत करना नादानी
ठंडी चीजों से बच रहना, पीना उबला पानी
“सागर” इस कोहरा से,करना खूब हिफाजत
स्कूलें भी बंद हो गये, रक्षा कवच सरकारी
शीत ऋतु में जाड़े का, जुल्म बढ़े बड़ा भारी।।
……..
मूल रचनाकार-
बेख़ौफ़ शायर डा.नरेश सागर
गोल्डन बुक आफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में नाम दर्ज

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