भारतीय संस्कृति का अनुपम,
यह पर्व अनूठा प्यारा है,
नवसंवत्सर की प्रथम किरण,
जन-जन का भाग्य सितारा है।
चैत्र शुक्ल की एकम् तिथि,
नूतन संवत् का द्वार खुला,
वर्ष प्रतिपदा के आँगन में,
श्रद्धा का पावन ज्वार खुला।
प्रकृति ओढ़कर नवल वासन्ती,
हरितिमा में मुस्काती है,
सुगंधित मलय पवन की लहरें,
सुप्त चेतना जगाती हैं।
खग-वृंदों का मधुर कलरव,
नभ में उल्लास जगाता है,
सृष्टि का कण-कण पुलकित हो,
मंगल गान सुनाता है।
धूप, दीप और बाती लेकर,
हम देवों का आह्वान करें,
अक्षत-चंदन तिलक लगाकर,
निज संस्कृति का सम्मान करें।
द्वार सजी है रंग-रंगोली,
खील-बताशे और गुझिया,
गुंजित है हर दिशा आज,
तजकर तनाव-अवसाद की दुनिया।
मिठास का यह महाकुंभ है,
रसगुल्लों की श्वेत प्रभा,
गुलाब जामुन और जलेबी,
बढ़ा रहे व्यंजन की सभा।
घेवर की भीनी खुशबू है,
गाजर का रसपूर्ण रसा,
बर्फी और बेसन के लड्डू,
जैसे सुख का सिन्धु बसा।
खीर और व्यंजनों की अवली,
समृद्धि का प्रतिमान बनी,
नव-संवत्सर ही तो है अपनी,
पूर्वजों की संचित थाती घनी।
मिष्टान्न पान और प्रेम भाव से,
कटुता का परिहार करें,
हिंदू नव-वर्ष के शुभ आगमन पर,
हम शुचिता का शृंगार करें।
हिंदू नव-वर्ष केवल तिथि का परिवर्तन नहीं,
नव-चेतना का विस्तार है,
भारतीय अस्मिता का पावन,
यह गौरवमयी त्यौहार है।
हृदय कुंज में खिले कमल,
और सद्भावों की सरिता बहे,
नवसंवत्सर की यह आभा,
युग-युगांतर तक अमिट रहे।
सुनील कुमार महला,
मोबाइल 9828108858




