साहित्य

सरस्वती वंदना सरसी छंद

डॉ गीता पांडेय अपराजिता

मनभावन छवि मातु तुम्हारी, करती जग उँजियार।
झंकृत कर दो अंतरमन माँ, वीणा की झंकार।।

वेद पुराणों की हो ज्ञाता, प्रसरित करती ज्ञान।
प्रखर ज्योति जगमग है जलती,लाती नवल बिहान।।

हंस वाहिनी जग कल्याणी,कर में पुस्तक धार।
आंँचल छांँव भक्त को देती, उर भरती सुख सार।।

अंतर-मन की जड़ता हर कर, सहज प्रखर प्रतिदान।
त्रय तापों को दूर करो मांँ, मिटे सकल अज्ञान।।

छंद विराजो शारद माता, बढे़ काव्य श्रृंगार।
जिसको पढ़कर के जग सारा, हो जाए बलिहार।।

अनहद नाद जगे मानस में, आई माता द्वार।
सुधा कलश भर दो आनंदित, माँगू यह उपहार।।

मैं अबोध अज्ञानी माते ,सुन लो करुण पुकार।
भवसागर में नाव फँसी है, करना इसको पार।।

वरद हस्त गीता पर धर दो,जोडू़ँ दोनों हाथ।
कृपा तुम्हारी नित बरसे माँ, प्रतिपल रहना साथ।।

डॉ गीता पांडेय अपराजिता

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
error: Content is protected !!