करे खूब अपना शृंगार

हर पूनम की रात चाँदनी, करे खूब अपना शृंगार ।
शीतलता बरसा पृथ्वी पर, जीवों को देती उपहार ।।
चाँद खिले जब भी पूनम का, तब मरुथल आता है याद ।
सैर करें मरुथल में जाकर, करें सदा परिजन फरियाद ।।
चाँद प्राप्त कर सूर्य-रश्मियाँ, शीतलता में बदले ताप,
करे सुशोभित निशा चाँदनी, दर्शाए पृथ्वी से प्यार ।
हर पूनम की रात चाँदनी, – – – –
निशा चाँदनी में भी कुछ की, होती नहीं उजाली रात ।
कब उनकी किस्मत में होती, सावन-भादो सी बरसात ।।
मित्र कभी मुझको ले जाए,खिलता जब पूनम का चाँद,
रात-चाँदनी सैर कराएं, उन सबका मानो उपकार ।
हर पूनम की रात चाँदनी, – – – –
सुधा लुटाता चाँद गगन से, पृथ्वी जन को देता दान ।
रात चाँदनी महा-कुम्भ में, कर्मवीर ही करते पान ।।
सद्कर्मों के पथ पर चलते, उनका ही चमके सौभाग्य,
सुप्त जिंदगी जागे जिसकी, उसका जीवन हो साकार ।
हर पूनम की रात चांदनी, – – – –
– लक्ष्मण लड़ीवाला ‘रामानुज’




