
आओ, कुछ कदम साथ चलें,
कुछ अपनी कहो, कुछ मेरी सुनो
आओ, कुछ कदम साथ चलें।
ज़िन्दगी का मिला है अन्तिम पड़ाव,
जाने कब तक ये रहेगा साथ,
एक दिन तो छूटेगा यह हाँथ।
उससे पहले ही करें मन की बात।
कुछ अपनी कहो, कुछ मेरी सुनो
आओ कुछ कदम साथ चलें।
अबतक जीते रहे घर – जंजाल में,
फ़ुरसत के पल न थे पास में,
चलते रहे बस कल की आस में,
आज सब है,दिखता नहीं कुछ पास में।
आओ बचे हुए पल-पल, जी भर गुनगुनाएं,
भावों के शब्दों को स्वर से सजाएं,
गीतों का मधुरिम चोला पहनाएं।
कुछ अपनी कहो, कुछ मेरी सुनो,
आओ कुछ कदम साथ चलें।
चलते हुए रस्ते में जो कोई मिल जाए,
दु:ख सुख उसके अपने में मिलाएंँ,
मुस्कान की रौशनी उसकी झोली में डालें,
शबनम आसुँओं की उसकी चुराएँ।
हँसी के फव्वारों से दुनिया सजाएंँ।
कुछ अपनी कहो, कुछ मेरी सुनो,
आओ कुछ कदम साथ चलें।
खुशियों को बांँटे औ गम बिसराएँ,
प्रभु का नाम लेते अवशेष वक्त बिताएँ।
करें प्रार्थना कल्याण सबका होए,
सबके संग-संग हमारे कर्म सध जाएँ।
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कुछ अपनी कहो, कुछ मेरी सुनो
आओ, कुछ कदम साथ चलें।
आओ कुछ कदम चलें साथ में।।
सुषमा श्रीवास्तव, रूद्रपुर, ऊधम सिंह नगर, उत्तराखंड।




