साहित्य

अस्तित्व की पुकार

दिनेश पाल सिंह दिलकश

आज वो टैक्स से नहीं,
आज वो तख़्त से नहीं,
आज वो रोटी, कपड़ा, मकान से नहीं—
आज वो ज़िंदा रहने से जूझ रहा है।
न जाति की शान चाहिए,
न सत्ता का सम्मान चाहिए,
आज बांग्लादेश का हिंदू
बस एक सुरक्षित आसमान चाहता है।
आज सवाल महंगाई का नहीं,
आज बहस बेरोज़गारी की नहीं,
आज एजेंडा सड़क–नाली का नहीं—
आज एजेंडा है
बच्चों की साँस,
माँ-बहनों की लाज,
और अपने नाम के साथ जीने का हक़।
जब घर जलते हैं पहचान से,
जब डर पलता है पूजा-स्थान से,
तब चुप रहना भी अपराध बन जाता है,
और मौन… इतिहास को शर्मिंदा कर जाता है।
ये उसका आज है—
पर इतिहास गवाह है,
जो आज अनसुना किया गया,
वही कल दस्तक बनकर आया है।
इसलिए आज आवाज़ बनो,
सिर्फ पोस्ट नहीं— प्रतिरोध बनो,
धर्म नहीं, धर्म की रक्षा के लिए खड़े हो,
और सबसे पहले— इंसान बनो।
क्योंकि अस्तित्व जब खतरे में हो,
तो तटस्थता कोई विकल्प नहीं होती।
*दिनेश पाल सिंह दिलकश*
*जनपद संभल उत्तर प्रदेश*

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
error: Content is protected !!