
सुबह सुबह जब आंख खुली
सिंदूरी रँग बिखरा था नभ में
लगा आज सृष्टि ने दोनों हाथों
आँचल अपना लहराया है।
मन यूँ ही श्वेत वीतरागी हो गया
बुद्ध सा चित्त बैरागी हो गया
कोई बच्चा यूँ ही मुस्कुरा गया
जहान शान्ति का पुजारी हो गया।
बरसती बूंदों में भीगती धरा को
कोई हरे रंग से सराबोर कर गया
कली कली खुल कर निखर गई
हथेली में कोई जैसे दूब धर गया।
©संजय मृदुल
रायपुर




