
मुस्कान लबों पर हल्की -हल्की, आंखों में अजीब सी हलचल है,
दिल के सूने आंगन में, चाहत का खिलाफ कोई उत्पल है।
तुम पास नहीं हो फिर भी क्यों, हर सांस में तेरी खुशबू है,
देखो बेनाम सा ये रिश्ता, कितना पावन निश्चल है।
ख्वाबों की हँसी वादी में सनम, हम तुम खोए रहते हैं,
धड़कन में छुपा जो राज तेरा, वही तो जीने का सबल है।
ये दूरियां मिट जाएगी एक दिन, तुम रखो भरोसा चाहत पर,
अब “आकाश” तुम्हारी यादों में, हर लम्हा रहता व्याकुल है।
पंडित मुल्क राज “आकाश”
गाजियाबाद उत्तर प्रदेश




