
कलम हमारा हथियार रही,
संगीनों में भी धार रही,
मंगल पांडे से आज़ाद तक,
विरासत हमने कही।
चाणक्य सी अद्भुत नीति,
भारत का आधार वही,
वीर शिवा और राणा ने,
धर्म-ध्वजा लहरायी थी।
जब हथियार उठाया हमने,
परशुराम को साध लिया,
आर्यभट्ट और वराहमिहिर को,
हमने तब प्रणाम किया।
शत्रु-दल के संहारक बन,
संगीनों पर सीना तान दिया,
सावरकर से निडर बन,
काला-पानी कारावास जिया।
शस्त्र-शास्त्र दोनों में ही,
निपुण जो हमें बनाते हैं,
हम भारत माँ के हैं बेटे,
हँसकर वीरगति पाते हैं।
जब-जब शस्त्र उठे रण में,
बाजीराव बन आए हैं,
बिस्मिल सी आग जलाकर हम,
कफ़न बाँधकर आए हैं।
भारत का आधार हमीं से है,
और विचारों की शक्ति,
जब-जब आधार विचार मिटे,
मिटे जो सबकी हस्ती।
हमने इतिहास के पन्नों पर,
हस्ताक्षर अपने छोड़ दिए,
स्वाभिमान पर जब आई,
सत्ताओं के मुख मोड़ दिए।
बुद्धि और शक्ति का हम,
एक सन्देश कहते हैं,
भारत की पहचान हैं हम,
इतना ही हम कहते हैं।
कवि,लेखक, गीतकार,साहित्यकार:-
धीरज कुमार शुक्ला’दर्श’
ग्राम-पिपलाज,तहसील-खानपुर,
जिला-झालावाड़ ,राजस्थान (३२६०३८)




