साहित्य

फिरते हैं बार बार जो

फ़ैज़ अहमद 'मीम'

फिरते हैं बार बार जो अपने ज़बान से
उनसे मिलाओ हाथ ज़माने में ध्यान से

रखना ज़रा तुम अपने परों को सँभाल कर
जलते हैं लोग बारहा ऊँची उड़ान से

धोका फ़रेब जिनके हो नीयत में बारहा
रब ही बचाए ऐसे हमें मेहरबान से

भाता नहीं है शोर शराबा ये शहर का
रहते हैं गाँव अपने कहीं इत्मिनान से

मंज़िल का है जुनूँ हमें यारो फ़क़त यहाँ
रुकते नहीं सफ़र में कभी हम थकान से

उनसे तो फ़ासला है ज़माने में यूँ मगर
निकले नहीं वो ‘मीम’ हमारे गुमान से
फ़ैज़ अहमद ‘मीम’
आरा बिहार

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