साहित्य

प्रभु श्री विश्वकर्मा भजन

चन्द्रगुप्त प्रसाद वर्मा "अकिंचन"

तू सबको ज्ञान देता है, तू पालनहार है सबका,
सभी इन्सान के जीवन का बेड़ा पार करता है।
सभी प्राणी तेरे बन्दे, तुम्हीं प्राणेश हो सबके,
सभी तो आत्म तेरे हैं, तुम्ही परमात्म हो इनके।
तुम्हीं तो विश्वसर्जक हो,तुम्हीं तो विश्वकर्मन हो,
तुम्हें शतशत नमन मेरा, तुम्हें प्रणिपात करते हैं।
तेरा ही आसरा चाहें, “अकिंचन” हैं सभी बन्दे,
दया है माँगता मानव दयानिधि तूँ ही भौवन है।
चलूँ मैं धर्म के पथ पर,सभी यह याचना करते,
वही भुवना – सुवन तूँ है,वही तू धर्म-नंदन है।

तुम्हीं तो वसु प्रभासी हो,तुम्हीं तो विश्वकर्मन हो,
तुम्हें शतशत नमन मेरा, तुम्हें प्रणिपात करते है।
न भटकें धर्म के पथ से, पथिक अज्ञान राही हैं,
सुपथ करता है जो ज्योतित,वही तूँ पंचआनन है।
तुम्हें है चाँद सूरज सा, इन्हें गुनवन्त भी करना,
इन्हें इल्मो-अमन देना, इन्हें दीपक जलाना है।
सरे संसार को रोशन, इन्हीं बन्दों को है करना ,
शिल्पी कौम का भगवन् , तुम्हें गौरव बढ़ाना है
कला कौशल से हे प्रभुवर इन्हें आमाल कर देना,
इन्हें इस देश की किश्ती तो नाविक बन चलाना है।
✍️चन्द्रगुप्त प्रसाद वर्मा “अकिंचन” गोरखपुर
चलभाष 9305988252

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