साहित्य

मुस्काते भोले संग मिलकर

कार्तिकेय कुमार त्रिपाठी 'राम'

मैं दिल की हर एक टहनी पर,
लिखता हूं बस शिव का नाम,
मद्धिम-मद्धिम बहे पवन जब,
खुशबू का आए पैगाम।
मैं दिल की …
मूरत छुपी हुई भोले की,
उपवन के हर पत्ते में,
सूरत जो देखी भोले की,
हार गए दिल सस्ते में।
मैं दिल की …
भिन्न-भिन्न फूलों के रंग से,
मुस्काती है हर एक डाली,
भोले के मंदिर में आकर,
बिखराती है खुशबू सारी।
मैं दिल की ….
जीवन की कब सुबह हुई,
और सांझ की कब बारी,
जो भोले से सुलह हुई तो,
जीवन की चल दी गाड़ी।
मैं दिल की ….
आना-जाना चलता रहता,
भोले का अब सपनों में,
मुस्काते हैं दोनों मिलकर,
अपनी-अपनी बातों में।
मैं दिल की ….
(251/309 वां मनका)
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कार्तिकेय कुमार त्रिपाठी ‘राम’
गांधीनगर,इन्दौर (म.प्र.)

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