
नजर का तीर था दिल पर, निशाने छोड़ आया है,
वह हंसकर आज फिर, ताजा बहाने छोड़ आया है।
उसे तो खेल लगता है, किसी के ख्वाब से खेलना,
मगर वो रूह में अपनी, निशाने छोड़ आया है।
उसे क्या इल्म की, यह दिल्लगी क्या जख्म देती है,
कि हँसते शहर में, वीरा ठिकाने छोड़ा आया है।
लुटा कर प्यार की दौलत, वो अब मशरूर बैठा है,
मगर “आकाश” के हिस्से, वीराने छोड़ आया है।
पंडित मुल्क राज “आकाश”
गाजियाबाद उत्तर प्रदेश




