
यह जीवन है एक रंगमंच गूढ़,
जहाँ प्रश्नों से भरा रहता हर सूत्र।
पात्र स्वयं से यहाँ अनभिज्ञ खड़ा,
और समय बना है निर्देशक अद्भुत।
पर्दे के पीछे लिखा गया जो सत्य,
वह ज़िंदगी के पटल पर सबने देखा।
इंसान ने चाहा कुछ और ही बनना,
पर उसके भाग्य ने कुछ और लिखा।
अपने संवाद न हमने स्वयं चुने,
न मौन रहना हमारे हाथों में रहा।
जो कहा गया और जो सहा गया,
वो बस नियति का खिलौना बना रहा।
कभी बुलंदियां का गौरव मिलता तो
कभी निर्बलता उसकी बनी पहचान।
दोनों में अंतर ज़मीन आसमान का ,
कभी मिले सम्मान तो कभी अपमान।
सूत्रधार मौन, पर उसकी सत्ता है अटल,
डोरें हैं अदृश्य और बंधन हैं प्रबल।
हम चले स्वतंत्रता का भ्रम पालकर,
पर पथ पहले से ही था अविचल।
तालियाँ भी क्षण भर के लिये बजीं,
और निंदाएँ भी धुंआ बन उड़ गईं।
जो टिक गया,वह पल का साक्षी बना,
जो बह गया, वह पल यादें बन गईं।
नायक, खलनायक,नाम मात्र है
सबकी भूमिकाएँ हैं समय की चाल।
जैसा कर्म करेंगे वैसा, फल मिलेगा,
ये हैं उपरवाले सूत्रधार का कमाल।
इस कठपुतली जीवन-लीला का,
अंत ही होता है बस, बोध का क्षण।
जब “मैं” टूटता है,तब जानते हैं
यह नाटक नहीं,ये है जीवन दर्शन।
सुमन बिष्ट, नोएडा



