साहित्य
यादों में जीता हूं फिर भी जिंदगी तुझे

जिंदगी कैसी हो
तुम, कितनी निर्दय हो
सालो से यादों में
जी रहा हूं
कभी कोई शिकायत नहीं की
तुझ से, फिर भी
तुम्हें कितनी जलन,इर्ष्या है
मुझे से, कितने दिन,माह हो गए
मुझे किसी अपने को
याद कर, सुख सुकून,महसूस करूं
तुम को, वह भी सुख और सुकून
मेरा रास नहीं आता है
क्या तुम्हें मेरे अलावा कोई
नज़र आता नही है
कमाल का प्यार है
तेरा, खैर, तुझे नाराज भी तो
नहीं कर सकता हूं
क्यों कि सच तो यह
में भी तुम से प्यार
कर बैठा हूं
क्या करूं
ईश्वर ने मुझे
ऐसा ही बना दिया
न चाहते हुए भी
देवता
में कभी भी
देवता बन,जीना नहीं चाहता था
पर उसने मुझे
क्या कर सकता हूं
जिंदगी बजाय
सब कुछ चुपचाप
स्वीकार करने के सिवा
प्रणाम तुझे
प्रणाम उस ईश्वर को
प्रणाम इस जीवन को
इसके अलावा मुझ
नाचीज़ के पास
कोई चारा नहीं
जिंदगी
डॉ रामशंकर चंचल
झाबुआ मध्य प्रदेश




