साहित्य

माँ

सुषमा श्रीवास्तव

जन्मदात्री से पालिका,सेविका,शिक्षिका औ मित्रता का भाव लिए माँ तो बस माँ होती है।
न दिन को दिन,न रात को रात समझती है।
लाल को आँखों का नूर समझती है।
जिसके हित दुनिया की हर शै से झगड़ती है।
आँच न आने पाए कैसी भी, स्वयं नज़र रखती है।
वो माँ होती है,बस माँ ही होती है।
आगे बढ़ते रहने की पल-पल दुआएं देती है।
जो हर मुसीबत की बलाएं अपने सिर लेती है।
सुखों का वितान लिए मानों हरदम मँडराती है।
दूर होकर भी पास का एहसास सदा दिलाती है।
माँ ही होती है,बस वो माँ ही होती है।
दर्द को पीकर भी,खुद को सुखी बताती है।
निकलते अश्रु को खुशी का पारावार कह देती है।
मेरे हर अनकहे दर्द को भी जाने कैसे समझती है।
सोते जागते निरंतर साथ रहने का आभास कराती है।
बस वह तो माँ होती है,माँ ही होती है।

सुषमा श्रीवास्तव, रूद्रपुर, उत्तराखंड।

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