साहित्य

होली

डा राजेश तिवारी मक्खन

चुम्बन ले गयो लाल गुलाल , सखि मैं कैसे तुम्हें बताऊं ।
कैसे तुम्हें बताऊं , सखि मैं तो कहितन शरमाऊं ।
चुम्बन ले गयो ……………………………….

छुपकर आयो वह नंदलाला ।
गले में पड़ी हती वन माला ।।
लगा गुलाल गयो गोपाला ।।
मो पर डाल प्रेम को जाला ।।
माना नहीं बहुत कहीं मैं तो , क्या क्या तुम्हें बताऊं।
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रंग गयी मैं तो श्याम के रंग में ।
वह समा गयो मोरे रग रग में ।।
सीधी ही जा रही थी मैं मग में ।
ढेड़ा बड़ा है वह इस जग में ।।
ढेड़ी, टांग, कमर ,गर्दन है , तुम्हें मैं कैसे समझाऊं।
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वो काला रंग वाला मतवाला ।
काली कमरिया ओढ़ने वाला ।।
दन्दी फन्दी वह है नन्द लाला ।
निर्मल मन तन का रंग काला ।।
मक्खन मन से करें दण्डवत , उसका ध्यान लगाऊं।

रंगी श्याम रंग सब ब्रजनारी ।
तन की गोरी मन भोली भारी।।
वे श्याम सुंदर की बाट निहारी ।
दर्शन दे जाओ और गिरिधारी ।।
ब्रज चौरासी कोस होस ने , श्री राधे राधे हि गाऊं।।

डा राजेश तिवारी मक्खन
झांसी उ प्र

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