
लघुकथा- सब्र का बाँध
“यह कैसा खाना बनाया है? तेरी माँ ने तुझे कुछ सिखाया नहीं?” पारुल को हर रोज की तरह फिर वही ताना मिला।
“अरे,मम्मी! भाभी के माँ-बाप ने तो इन्हें ठीक से बातचीत करना भी नहीं सिखाया। हर वक्त गूँगों की तरह व्यवहार करती हैं।”ननद मोना कहाँ पीछे रहने वाली थी।
“अरे छोड़ो! वह तो भैया को ये पसंद थीं वरना इनके
घरवालों की तो इतनी भी औकात नहीं कि हमारे बराबर खड़े हो सकें। भूखे- नंगे लोग।” देवर मोहित ने नहले पर दहला मारा।
“बस—–।” पारुल पूरी ताकत से चीखी।”बहुत हुआ। बहुत सुन ली आप लोगों की बकवास। मैं कुछ नहीं बोलती तो आप लोग सिर पर ही चढ़े जाते हो। यह तो मनोज की जिद्द थी कि शादी कोर्ट में बिना किसी खर्च और लेनदेन के सादगी से हो और गूँगी नहीं हूँ मैं। अपने कॉलेज की होनहार छात्रा रही हूँ, एमबीए पढ़ी हूँ, बस मोहित के परिवार के रूप में आप सबका सम्मान करती थी पर अब और नहीं। आज से जैसे को तैसा जवाब दिया जाएगा।”
“देख ले मोहित! तेरी बीवी की जुबान को।” अंजू ने बेटे को ताना मारा।
” माँ! किसी को इतना भी नहीं सताना चाहिए कि उसके सब्र का बाँध टूट जाए। सुधर जाओ वरना कहीं ऐसा न हो कि मुझे अलग घर बसाना पड़ जाए।”मोहित ने कहा तो सब की आँखें शर्म से झुक गईं।
डॉ ऋतु अग्रवाल
मेरठ,उत्तर प्रदेश




