साहित्य

तुम्हारे बिन

पंडित मुल्क राज "आकाश"

तुम्हारे बिन सूना सा लगता मेरा कुल संसार,
मेरी हर एक स्वास में प्रिय तुम्हारा ही प्यार।

तुम चांदनी की शीतल आस उगते सूरज का तेज हो तुम,
मेरे जीवन के पहलू हर संगीत का अनमोल साज़ हो तुम।

फूलों की कोमल मुस्कान और सावन के झोंको सा एहसास हो,
तुमसे ही शुरू होती खुशियां तुम ही हर पल मेरे पास हो।

सागर की अनंत लहरों सी चंचल और गहरी तुम्हारी याद है,
मेरे इस तड़पते दिल को सुकून देती तुम्हारी ही मीठी फरियाद है।

मैंने पूर्णत: समर्पित कर दिया तुझको अपने जीवन का उजास,
अनंत “आकाश” की गहराइयों सा अटूट और अमिट मेरा विश्वास।

तुम ही मेरी धड़कन की हलचल हो और तुम ही सबसे खास।
मोन की गहराइयों में भी गूंजता बस तुम ही रूहानी स्वास।

मेरी रग रग में लहू बनकर दौड़ता तुम्हारा ही पावन इकरार है,
जैसे मंदिर की चौखट पर जलता दिया और चंदन की महक जोरदार है,
प्रार्थना है प्रभु से ता उम्र बना रहे तुम्हारा साथ,
हर जन्म में हो हाथों में बस तुम्हारा ही हाथ।

पंडित मुल्क राज “आकाश”
गाजियाबाद उत्तर प्रदेश

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