
जग पालक श्री श्याम, धरूं मैं ध्यान आपका ।
तू ही कृपालु दाता है, तू ही दया निधान है ।।
मिली कृपा जिसे तेरी, हो गया भव पार वो ।
जग में भी मिले देखो, उसे तो फिर मान है ।।
घनेरे कष्ट हैं दाता, क्या करूं अरदास मैं ।
छिपे जो दर्द हैं मेरे, तुझे तो सब भान है ।।
विनती ये सुनो मेरी, दूर हो दुर्विकार भी ।
संगत भी करूं ऐसी, मिले जो भक्ति ज्ञान है ।।
दुखी का दर्द मैं बांटू, प्रेम की रख भावना ।
मानुष जन्म पाया है, ये तेरा एहसान है ।।
लगा दूं कर्म में काया, क्यों इसे अब पालना ।
करूं क्यों गर्व माटी का, होगा जो कल खाक है ।
नीलम अग्रवाल “रत्न” बैंगलोर
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