शाख नव पल्लव लिए है, बह रही मृदु वात है।
ऋतु वसंती छा गई फिर, नव मिली सौगात है।।
अब नहीं दिखता कहीं पर, धुन्ध का अवशेष है,
छिप रहा जो अंशुमाली, लग रहा अनिमेष है,
कूक, कोकिल कर रही नव, स्वर मृदुल में बात है।
ऋतु वसंती छा गई फिर, नव मिली सौगात है।।
नीर चंचल फिर हुआ है, हिम कहीं जमता नहीं,
चेतना स्पंदित हुई नव, चल अचल बनता नहीं,
झील दर्पण बन गयी फिर, दे रही जलजात है।
ऋतु वसंती छा गई फिर, नव मिली सौगात है।।
साॅंझ भी अब खोल अंतस, कर रही फिर बात है,
सज रही दल तारकों से, तम भरी फिर रात है,
शीत का अब भय न कोई, अब प्रफुल्लित प्रात है।
ऋतु वसंती छा गई अब, नव मिली सौगात है।।
जड़ न चेतन कुछ बचा है, सब प्रभावित लग रहे,
सुप्त थे जो भाव कब से, फिर विकल मन कर रहे,
दे रही जो ऋतु निमंत्रण, क्या तुम्हें भी ज्ञात है?
ऋतु वसंती छा गई अब, नव मिली सौगात है।।
डॉ. पवन कुमार पाण्डे
असोसिएट प्रोफेसर
निजामाबाद तेलंगाना
9848781540




