
बह चली वो हवा,
वह चली वो हवा।
तूने देखी नहीं,
मैंने देखी नहीं,
भूत है क्या कोई,
या हौआ है हवा?
दीप की बत्तियाँ,
पेड़ की पत्तियां,
हैं बताती हमें,
गुजरती है हवा।
दोपहर प्रात में,
साँझ में रात में,
देखो सन-सन बही
वो सुहानी हवा।
साँस तेरी रुके,
साँस मेरी रुके,
जिन्दगी है नहीं,
हो नहीं जो हवा।
पवन है वात है,
अनिल प्रवात है
नाम मारुत भी है,
पवनमान है हवा।
नरेश चन्द्र उनियाल
“कमली कुंज”
देहरादून, उत्तराखण्ड।




