आलेख

डिलीट होती चिट्ठियाँ

डॉ ऋतु अग्रवाल

संदेशों का संसार बड़ा रोमांचकारी है। संदेश हमारी भावनाओं को स्पंदित, उद्वेलित करते हैं। सुखद संदेश हमें खुशियों के आशावान संसार में पहुँचा देते हैं जबकि दुखद संदेश हमें दुख के अथाह सागर में गोते लगवा देता है। इन संदेशों के माध्यम समय-समय पर बदलते रहे हैं। कबूतरों, हरकारों, ध्वनि संदेशों से होते हुए संदेश चिट्ठी पत्री तक जा पहुँचे और वर्तमान समय में यह डिजिटल रूप ले चुका है।
भाषा के लिखित रूप के उद्भव एवं विकास के साथ ही संदेश चिट्ठियों के माध्यम से अपने प्रियजनों तक पहुँचाए जाते थे। पत्तियों, शिला, कपड़े पर लिखे पत्र आज भले ही पुरातत्व धरोहर हैं किंतु कागज पर लिखी चिट्ठियों को ज़माना नहीं बीता है। आज से तकरीबन बीस से पच्चीस वर्ष पहले तक इनका खूब चलन था।
पीली चिट्ठी,अंतर्देशीय पत्र और लिफाफे काफी प्रचलन में थे यद्यपि इनके द्वारा संदेश पहुंचने में कुछ समय लग जाया करता था फिर भी लोग बेसब्री से चिट्ठियों का इंतजार किया करते थे और चिट्ठी मिलने पर ऐसे खुश होते थे जैसे कोई छोटा बच्चा मनपसंद खिलौना मिलने पर प्रसन्न होता है। फिर बार-बार उन चिट्ठियों को पढ़ा करते और सहेज कर रख देते।
फिर आया संचार क्रांति का युग। मोबाइल और इंटरनेट ने संदेश जगत में तहलका मचा दिया। जहाँ पत्रों के जरिए कुछ दिनों में संदेश प्रसारित होते थे, वहीं अब चंद सेकंड में आप घर बैठे अपने संदेश दुनियाभर में कहीं भी पहुँचा सकते हैं। पलों में अपनों की खैरियत जान लेना उंगलियों की थिरकन मात्र रह गया है। खुशी के, गम के संदेश भेजकर और प्राप्त कर अपनेपन की गरमाहट को महसूस कर लेना बहुत आसान हो गया है।
परंतु हर वाद के साथ अपवाद भी जुड़ा रहता है। भले ही डिजिटल माध्यम से संदेश भेजना बहुत ही सरल, सहज और सुगम हो गया है पर इस बात से हम मुँह नहीं मोड़ सकते हैं कि इतने ही सहज, सरल और सुगम तरीके से उन संदेशों को मिटाना भी आसान हो गया है। बस एक क्लिक और संदेश समाप्त। जो आत्मीयता, अपनापन कागज पर लिखे संदेश में था जिन्हें हम साल दर साल सँभाल कर रखा करते थे, गाहे-बेगाहे समय मिलने पर पढ़ा करते थे और और उन यादों में, भावनाओं में पुनः पुनः खो जाया करते थे और अपने परिचितों और रिश्तेदारों से मिलने को आतुर हो जाया करते थे, क्या वही जज्बातों का सैलाब इन डिजिटल या आभासी माध्यम से मिलने वाले संदेशों को पढ़कर भी उमड़ा करता है? सब कुछ यांत्रिकी सा लगता है। जितनी तेजी से संदेश आते हैं उतनी ही तेजी से संदेश मिटा भी दिए जाते हैं।
शुभ प्रभात, सुप्रभात, शुभ रात्रि, शुभ संध्या, गुड नाईट के संदेश तो ज्यों के त्यों दूसरे की थाली में परोस दिए जाते हैं। ना कोई प्रतिक्रिया ना कोई भावना। बस मैसेज फॉरवर्ड कर दिए जाते हैं सिर्फ एक मशीनी अंदाज में। इसके अलावा हमारे परिचितों, सगे संबंधियों, मित्रों से मिलने वाले संदेश फोन की मेमोरी भरते ही ऐसे डिलीट कर दिए जाते हैं जैसे अत्यधिक पेट भर जाने पर मतली कर दी जाती है अन्यथा फोन के हैंग होने का भय होता है जिसके परिणाम स्वरुप फोन काम करना बंद कर देगा।
अति प्रिय मैसेज को भी ज्यादा दिन तक हम अपने फोन में नहीं रख पाते। चैट क्लियर करनी ही पड़ती है। जबकि डिजिटल संदेश बहुत लंबे नहीं होते। न अपनी कुशल क्षेम न दूसरे का हालचाल। बस प्रेषित कर दिए जाते हैं तो कुछ जरूरी शब्द, उस कार्य या कार्यक्रम की सूचना देने के लिए जिसके लिए कीबोर्ड पर उंगलियाँ चलाई गई थीं और उन्हीं उंगलियों की सहायता से भी चिट्ठियाँ डिलीट भी कर दी जाती हैं और फिर हमारे दिमाग की मेमोरी से भी वे चिट्ठियाँ डिलीट हो जाती हैं। यांत्रिक होती दुनिया के साथ संदेश भी यांत्रिक हो रहे हैं। हम भी यांत्रिक हो रहे हैं और यंत्रों के पास सहेजने के लिए कुछ नहीं होता,ना भावनाएँ,ना प्रेम और ना चिट्ठियाँ।

डॉ ऋतु अग्रवाल
मेरठ

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