आलेख

बिहार से लंका तक: साहित्य, श्रद्धा और संस्कृति

सत्येन्द्र कुमार पाठक

बिहार की मिट्टी से कोलंबो के आसमान तक मेरी यात्रा 8 जनवरी 2026 को अरवल जिले के करपी से शुरू हुई। जहानाबाद से ट्रेन और फिर पटना के जयप्रकाश नारायण एयरपोर्ट से चेन्नई होते हुए मैं श्रीलंका की राजधानी कोलंबो पहुँचा। इस यात्रा का उद्देश्य था—पूर्वोत्तर हिंदी अकादमी के 20वें लेखक मिलन शिविर में भाग लेना। कोलंबो एयरपोर्ट पर उतरते ही मन में श्रद्धा के भाव थे। 9 जनवरी की सुबह जब भगवान भास्कर के दर्शन हुए, तो ऐसा लगा मानो माता सीता की यातना भूमि और प्रभु राम के चरणों से पवित्र इस लंका की धरती मेरा स्वागत कर रही है। यहाँ मुझे पता चला कि सीता जी को ‘श्री’ भी कहा जाता है, इसीलिए इस देश का नाम ‘श्रीलंका’ पड़ा।
मदु गंगा: प्रकृति और रोमांच का संगम के लिए हमारी यात्रा का पहला पड़ाव मदु गंगा नदी की सफारी थी। गाले जिले में स्थित यह नदी अपनी जैव विविधता के लिए प्रसिद्ध है। 134 किमी लंबी इस नदी में बोटिंग करते समय ऐसा आभास हुआ जैसे मैं अंडमान के जारवा क्षेत्रों में घूम रहा हूँ। मैंग्रोव वनों के बीच हमने मगरमच्छ के बच्चे को हाथ में लिया, नारंगी रंग के नारियल का मीठा पानी पिया और दालचीनी के बागान देखे। नदी के बीच स्थित कोठदुवा मंदिर और द्वीपों पर भगवान बुद्ध व गणेश जी की मूर्तियाँ देखकर मन श्रद्धा से भर गया।
शाम होते ही हम हिक्कादुआ पहुँचे, जहाँ समुद्र की लहरों की गूँज के बीच ‘लेखक मिलन शिविर’ का भव्य उद्घाटन हुआ। डॉ. अकेला भाई और अन्य साहित्यकारों की उपस्थिति में काव्य सम्मेलन हुआ। समुद्र किनारे रात्रि भोजन का अनुभव किसी स्वप्न जैसा था।
अशोक वाटिका: भक्ति और भावनाओं का मिलन – अगले दिन हमारी बसें ‘नुवारा एलिया’ की ओर बढ़ीं। पहाड़ी रास्तों की हरियाली और जलप्रपात सिक्किम व मेघालय की याद दिला रहे थे। अशोक वाटिका: वह स्थान देखा जहाँ माता सीता रावण की कैद में थीं। सीता मंदिर में राम-लक्ष्मण-सीता की प्रतिमाओं के साथ-साथ हनुमान जी के पद-चिह्न आज भी उस कालखंड की याद दिलाते हैं। हालांकि अब वहां अशोक के वृक्ष कम और यूकेलिप्टस अधिक हैं, पर वहां की हवा में आज भी एक पवित्र शांति महसूस होती है। यात्रा का समापन कोलंबो के ऐतिहासिक ग्रांड ओरिएंटल होटल (1837 में निर्मित) और स्वामी विवेकानंद सांस्कृतिक केंद्र में हुआ।
हिंदी का गौरव: 11 जनवरी को ‘हिंदी वैश्विक भाषा’ पर आयोजित संगोष्ठी में देश के 18 राज्यों के 101 साहित्यकारों ने हिस्सा लिया। एक दिलचस्प अवलोकन में : मैंने अनुभव किया कि कैसे हिंदी संपर्क भाषा के रूप में उत्तर और दक्षिण भारत को जोड़ रही है। चेन्नई मेल में एक मद्रासी और बंगाली यात्री को हिंदी में बात करते देख मेरा विश्वास और दृढ़ हो गया कि हिंदी वास्तव में वैश्विक पहचान बना चुकी है।
यात्रा के विशेष अनुभव में मुद्रा विनिमय – भारतीय मुद्रा के बदले तीन गुना श्रीलंकाई मुद्रा प्राप्त हुई। स्वच्छता बस स्टाफ द्वारा कचरा इकट्ठा करने की व्यवस्था देख श्रीलंका की सफाई का राज समझ आया। स्वाद दालचीनी की चाय और वहां के स्थानीय फल महंगे तो थे पर लाजवाब थे। होटल ग्रांड ओरिएंटल होटल से कोलंबो बंदरगाह का नजारा अद्भुत था। : यह यात्रा केवल भौगोलिक भ्रमण नहीं, बल्कि भाषाई और आध्यात्मिक जुड़ाव का एक सेतु थी। श्रीलंका की साफ-सुथरी सड़कें, अनुशासित लोग और वहां की प्राकृतिक सुंदरता मेरे लेखन के लिए अनमोल थाती (धरोहर) बन गई है।
: श्रद्धा, साहित्य और समंदर के बीच एक जादुई सफर – कुछ यात्राएं केवल दूरियां नापने के लिए नहीं, बल्कि खुद को और अपनी संस्कृति को नए नजरिए से देखने के लिए होती हैं। जब मैंने 8 जनवरी 2026 को बिहार के अरवल जिले के करपी से अपने सफर की शुरुआत की, तो मन में एक उत्साह था और हृदय में प्रभु राम और माता सीता के प्रति अगाध श्रद्धा। यह यात्रा थी—श्रीलंका की, उस पावन धरती की जिसे हम रामायण के पन्नों में पढ़ते आए हैं। मेरी यात्रा का श्रीगणेश अरवल के करपी से हुआ। जहानाबाद से ट्रेन पकड़कर मैं पटना पहुँचा और फिर पटना जंक्शन से ऑटो के जरिए जयप्रकाश नारायण अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा। वहां से उड़ान भरी चेन्नई के लिए।
चेन्नई एयरपोर्ट पर प्रतीक्षा के दौरान मुझे एक सुखद अनुभव हुआ। सुरक्षा द्वार पर तैनात एक बिहारी भाई से मुलाकात हुई। परदेस में जब अपनी मिट्टी का कोई मिल जाता है, तो सफर की थकान आधी रह जाती है। उन्होंने बड़े प्रेम से मार्गदर्शन किया। इमिग्रेशन और सुरक्षा जांच की प्रक्रियाओं को पार करते हुए मैं चेन्नई से कोलंबो के लिए रवाना हुआ।
9 जनवरी 2026 की रात जब मैं कोलंबो के भंडारानायके अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर उतरा, तो मन में एक अजीब सी शांति थी। रात भर हमने वहां रुककर भगवान भास्कर (सूर्य देव) के उदय होने की प्रतीक्षा की, ताकि श्रीलंका की धरती पर उनकी पहली किरण के साथ अपनी यात्रा का आरंभ कर सकें।
सुबह होते ही ‘एशियन आइलैंड’ टूर कंपनी की बसें हमें लेने आ गईं। यहाँ एक बात जो सबसे पहले दिल जीत लेती है, वह है यहाँ की स्वच्छता। हमारी बस में जलपान के बाद एयर होस्टेस की तर्ज पर स्टाफ ने सारा कचरा इकट्ठा कर लिया। शायद यही छोटे-छोटे संस्कार श्रीलंका को इतना साफ-सुथरा बनाते हैं।
एक रोचक तथ्य: यात्रा के दौरान एक मित्र ने बताया कि ‘लंका’ का नाम ‘श्रीलंका’ माता सीता के कारण ही पड़ा। सीता जी को ‘श्री’ भी कहा जाता है, इसलिए उनके सम्मान में यह द्वीप ‘श्रीलंका’ कहलाया।
मदु गंगा: मैंग्रोव वनों के बीच एक रोमांचक सफारी – हमारी पहली बड़ी मंजिल थी मदु गंगा नदी। गाले जिले में स्थित यह नदी अपनी जैव विविधता के लिए पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है। मुख्य मार्ग से करीब 500-600 मीटर पैदल चलने के बाद हम नदी किनारे पहुँचे। यहाँ करीब 2000 श्रीलंकाई रुपयों में एक मोटर बोट बुक होती है।
जैव विविधता: यह नदी लगभग 134 किमी लंबी है और एक ‘रामसर साइट’ (महत्वपूर्ण आर्द्रभूमि) है।
: बोटिंग करते समय ऐसा लग रहा था मानो हम अंडमान के जारवा क्षेत्रों से गुजर रहे हों। चारों तरफ गहरे मैंग्रोव वन और पानी की कल-कल ध्वनि।मगरमच्छ से मुलाकात: एक जगह हमने मगरमच्छ के छोटे बच्चे को हाथ में लेकर तस्वीरें खिंचवाईं। वह अनुभव थोड़ा डरावना लेकिन रोमांचक था।नारंगी नारियल का स्वाद: यहाँ हमने नारंगी रंग का नारियल पानी पिया। ऐसा स्वाद मुझे कोलकाता के पीले डाब में भी नहीं मिला था।दालचीनी का जादू: श्रीलंका की दालचीनी दुनिया में सबसे उत्तम मानी जाती है। हमने वहां दालचीनी की चाय पी और इसे बनाने की पारंपरिक विधि देखी।
मदु गंगा की यादें समेटकर हम हिक्कादुआ पहुँचे। यहाँ ‘पूर्वोत्तर हिंदी अकादमी’ के 20वें लेखक मिलन शिविर का भव्य उद्घाटन होना था। हिक्कादुआ के प्लाजा बीच होटल की विशाल छत पर, सामने लहराते हिंद महासागर को देखते हुए जब दीप प्रज्वलित हुआ, तो वातावरण साहित्यिक ऊर्जा से भर गया। डॉ. अकेला भाई के नेतृत्व में देश के 18 राज्यों से आए 101 साहित्यकारों ने अपनी कविताओं और आलेखों से समां बांध दिया। रात के अंधेरे में समंदर की लहरों की गर्जना और कवियों की वाणी—यह एक ऐसा अनुभव था जिसे शब्दों में बांधना कठिन है।
नुवारा एलिया: अशोक वाटिका की स्मृतियाँ – अगले दिन हम ‘नुवारा एलिया’ के लिए रवाना हुए। यहाँ के रास्ते किसी जन्नत से कम नहीं हैं। ऊंचे-ऊंचे पहाड़, बादलों को छूते जंगल और टेढ़े-मेढ़े सर्पाकार रास्ते। दृश्य इतने नयनाभिराम थे कि रफी साहब का वह गीत याद आ गया— “दिल कहे रुक जा रे रुक जा, जो यहाँ है वो कहीं पर नहीं।” यहाँ की महंगाई ने थोड़ा चौंकाया। एक भुट्टा 100 रुपये, अधपका आम 100 रुपये और पका कटहल 800 रुपये किलो। लेकिन उस प्राकृतिक सुंदरता के आगे सब गौण था। अशोक वाटिका दर्शन: यही वह स्थान है जहाँ माता सीता रावण की कैद में रही थीं। यहाँ एक सुंदर मंदिर है जहाँ राम, लक्ष्मण और सीता जी की प्रतिमाएँ स्थापित हैं। पास ही एक नाले के पास हनुमान जी के विशाल पैरों के निशान मौजूद हैं। हालांकि अब वहां पुराने अशोक के वृक्ष नहीं रहे, लेकिन उस स्थान की ऊर्जा आज भी रामायण काल की याद दिलाती है।
यात्रा के अंतिम चरण में हम कोलंबो के ऐतिहासिक ‘ग्रांड ओरिएंटल होटल’ पहुँचे। 1837 में बना यह होटल अपने आप में एक संग्रहालय जैसा है। हमारे कमरे से सीधे कोलंबो बंदरगाह (Port) दिखाई देता था।
हिंदी की वैश्विक गूँज: 11 जनवरी को स्वामी विवेकानंद सांस्कृतिक केंद्र (भारतीय उच्चायोग) में एक संगोष्ठी हुई। विषय था— “हिंदी: एक वैश्विक भाषा”। 18 राज्यों के लेखकों ने यहाँ अपनी प्रस्तुति दी।यहाँ मुझे एक बहुत महत्वपूर्ण बात समझ आई। हिंदी केवल उत्तर भारतीयों की भाषा नहीं है, बल्कि यह जोड़ने वाली भाषा है। मैंने अपनी ट्रेन यात्रा के दौरान देखा कि कैसे एक मद्रासी और एक बंगाली यात्री आपस में संवाद करने के लिए हिंदी का सहारा ले रहे थे। जब दो अलग-अलग प्रांतों के लोग मिलते हैं, तो हिंदी ही वह सेतु बनती है जो उन्हें जोड़ती है।
सुबह की शुरुआत :में पहाड़ों की गोद में बसा ‘कैंडी’ और बुद्ध की पावन स्मृतियाँ का कोलंबो की साहित्यिक गोष्ठियों और हिंदी की गूँज को पीछे छोड़ते हुए, 12 जनवरी 2026 की सुबह 6 बजे हमारी बसें ‘पहाड़ों की रानी’ कैंडी की ओर रवाना हुईं। कोलंबो की आधुनिकता से निकलकर हम अब श्रीलंका के उस हृदय स्थल की ओर बढ़ रहे थे, जो अपनी संस्कृति, इतिहास और प्राकृतिक सौंदर्य के लिए पूरी दुनिया में जाना जाता है।
जैसे-जैसे बस कोलंबो से दूर हुई, रास्ते का मिज़ाज बदलने लगा। अब समुद्र पीछे छूट चुका था और सामने ऊंचे-ऊंचे पहाड़ हमारा स्वागत कर रहे थे। चाय के बागान: रास्तों के दोनों तरफ मखमली हरे रंग की चादर ओढ़े चाय के बागान ऐसे लग रहे थे मानो प्रकृति ने खुद को सँवारा हो।
बौछारें और धुंध: पहाड़ी रास्ता होने के कारण कहीं हल्की धुंध थी तो कहीं बादलों की बौछारें। पेड़ों की हरियाली वैसी ही साफ-सुथरी थी जैसी आपने मदु गंगा के रास्ते में देखी थी—धूल का नामोनिशान नहीं।
कैंडी पहुँचने से पहले हमें पिननावला एलीफेंट ऑर्फनेज (हाथी अनाथालय) देखने का अवसर मिला। नदी में एक साथ दर्जनों हाथियों को अठखेलियाँ करते और नहाते देखना एक अद्भुत दृश्य था। जीव-जंतुओं के प्रति श्रीलंका के लोगों का प्रेम और उनकी देखभाल वाकई अनुकरणीय है
कैंडी पहुँचते ही हम सीधे ‘टेम्पल ऑफ द सेक्रेड टूथ रेलिक’ (दलदा मालिगावा) पहुँचे। यह मंदिर एक सुंदर झील (कैंडी लेक) के किनारे स्थित है। यहाँ भगवान बुद्ध का पवित्र दंत अवशेष रखा गया है। मंदिर में प्रवेश करते ही सफेद कपड़ों में श्रद्धालु और हाथों में कमल व चमेली के फूलों की सुगंध मन को एक अलग ही लोक में ले जाती है।
मंदिर की नक्काशी और छतों पर बनी स्वर्ण आकृतियाँ देखकर प्राचीन कलाकारों की मेहनत का अंदाज़ा लगाया जा सकता है। हम सभी लेखकों और कवियों ने वहाँ कुछ देर मौन रहकर उस शांति को आत्मसात किया।
शाम को हमने कैंडी का पारंपरिक सांस्कृतिक नृत्य देखा। ढोल (Geta Beraya) की थाप पर नर्तकों के अद्भुत करतब और अंत में आग पर चलने का रोमांचकारी प्रदर्शन देखकर हम सब स्तब्ध रह गए। ऐसा लगा मानो श्रीलंका अपनी पूरी विरासत को एक ही मंच पर समेट लाया हो।
रात को कैंडी के एक खूबसूरत होटल में रुकने की व्यवस्था थी। थकावट तो थी, लेकिन मन तृप्त था। होटल की बालकनी से रात में कैंडी शहर और उसकी जगमगाती झील का नज़ारा किसी फिल्म के दृश्य जैसा था। हमारे साथी साहित्यकार अपनी-अपनी डायरियों में दिनभर के अनुभवों को शब्दों में पिरो रहे थे।
कैंडी की यह यात्रा हमें यह सिखा गई कि प्रगति के साथ अपनी परंपराओं को कैसे जीवित रखा जाता है। अगर कोलंबो श्रीलंका का ‘मस्तिष्क’ है, तो कैंडी निश्चित रूप से उसकी ‘आत्मा’ है।
कैंडी की यात्रा में एक साहित्यकार और एक भक्त के तौर पर आपके व्यक्तिगत अनुभवों को जोड़ते हुए, इस वृत्तांत में वह ‘आत्मीय स्पर्श’ शामिल करते हैं, जो इसे साधारण यात्रा से अलग बनाता है:
जब हम कैंडी की गलियों में दाखिल हुए, तो एक लेखक के तौर पर मैंने वहां कुछ ऐसी चीजें महसूस कीं जो शायद किसी गाइड बुक में नहीं मिलतीं। यहाँ मेरे कुछ निजी अनुभव हैं: ।. भाषा की दीवार और मुस्कुराहट का सेतु: कैंडी के बाज़ार में एक छोटी सी दुकान पर जब मैं स्थानीय फल देखने रुका, तो दुकानदार को न हिंदी आती थी, न मुझे उनकी ‘सिंहली’। लेकिन जब मैंने टूटी-फूटी अंग्रेजी और इशारों में बात की, तो उसने बड़ी आत्मीयता से मुझे चखने के लिए एक फल दिया। वहां मैंने महसूस किया कि ‘मुस्कुराहट’ दुनिया की सबसे बड़ी भाषा है। बिहार के किसी छोटे गांव की तरह ही वहां के लोगों में भी वही सादगी और मेहमाननवाजी दिखी।
. पवित्र दंत मंदिर में ‘मौन’ का संवाद: मंदिर के भीतर जब मैं उस स्वर्ण कक्ष के सामने खड़ा था जहाँ भगवान बुद्ध का अवशेष है, तो चारों तरफ बहुत भीड़ थी, लेकिन मेरे भीतर एकदम सन्नाटा था। वहां मैंने गौर किया कि लोग बिना शोर मचाए, कतारबद्ध होकर श्रद्धा सुमन अर्पित कर रहे थे। एक लेखक के तौर पर मैंने महसूस किया कि भक्ति में शोर की नहीं, भावना की जरूरत होती है। वहां बैठकर मैंने अपनी डायरी में दो पंक्तियाँ लिखीं— “बुद्ध केवल मंदिर में नहीं, वहां के लोगों के अनुशासन में भी बसे हैं।” . कैंडी झील के किनारे एक लेखक की सोच: शाम को जब हम कैंडी झील के किनारे टहल रहे थे, तो डूबते सूरज की रोशनी पानी पर तैर रही थी। वहां की स्वच्छता देखकर मन में एक टीस उठी कि काश हमारे देश के पवित्र सरोवरों और नदियों के किनारे भी इतने ही स्वच्छ और शांत होते। वहां का वातावरण इतना प्रेरक था कि मन हुआ कि काश वहीं बैठकर एक पूरी कविता लिख डालूँ। साहित्यकारों का वो ‘अपनत्व’: बिहार, हिमाचल और अन्य राज्यों से आए हम 101 साहित्यकारों के बीच कैंडी की ठंडक में जो गर्मजोशी भरी चर्चाएँ हुईं, वो अनमोल थीं। रात को डिनर टेबल पर जब ‘अकेला भाई’ ने अपनी पुरानी यादें साझा कीं, तो लगा ही नहीं कि हम विदेश में हैं। ऐसा लग रहा था मानो हम भारत के ही किसी हिल स्टेशन पर एक बड़े परिवार के साथ बैठे हैं। . वो चाय का स्वाद: नुवारा एलिया और कैंडी के बीच के रास्तों पर मिलने वाली असली ‘सीलोन टी’ का स्वाद आज भी मेरी ज़ुबान पर है। बिना दूध की उस कड़क चाय ने पहाड़ी सफर की सारी थकान मिटा दी थी।
कैंडी की यात्रा ने मुझे सिखाया कि चाहे देश बदल जाए, लेकिन ‘श्रद्धा’ और ‘साहित्य’ का स्वभाव एक जैसा ही रहता है। कैंडी ने मेरे भीतर के ‘लेखक’ को नए विचार दिए और मेरे भीतर के ‘भक्त’ को एक नई शांति।

करपी , अरवल , बिहार 804419
9472987491

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